9. संघीय संरचना समिति - Page 164

संघीय ढांचा समिति

147

दिया है कि संघीय सरकार को अपनी सभी इकाइयों से अंशदान करने का अधिकार होना चाहिए। मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह उपाय सुरक्षित और सुनिश्चित उपाय है? क्या यह ऐसा उपाय है, जिस पर हर किसी स्थिति में निर्भर रहा जा सकता है? गंभीर आपातकाल में संघीय सरकार को अंशदान करने की इच्छा के बारे में कल मेरे एक सम्माननीय मित्र ने एक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था कि अगर प्रांतों को गंभीर आपातकाल में संघीय सरकार की सहायता करनी पड़ेगी, तब प्रांतों को यह विवेकाधिकार दिया जाना चाहिए कि कोई आपातकाल है या नहीं। अब मैं यह नहीं कह सकता कि इस दृष्टिकोण को सब लोग स्वीकार करेंगे या नहीं, लेकिन यह दृष्टिकोण एक बात का सूचक अवश्य है कि जब कभी आपातकाल की स्थिति पैदा होगी तब विभिन्न प्रांत संघीय सरकार के घाटे को पूरा करने के लिए तैयार नहीं होंगे। क्या आपातकाल की स्थिति में राज्यों पर उनसे उनका अंश प्राप्त करने के लिए निर्भर रहा जा सकता है? मैंने यह प्रश्न उठाया है, लेकिन मैं यह नहीं समझता कि मैं इसका उत्तर भी दूं। जो भी हो, मेरा ख्याल है कि यह प्रणाली निर्भर रहने योग्य नहीं है। जहां तक प्रांतों की सामर्थ्य का प्रश्न है, हम इस संबंध में थोड़ा बहुत निश्चित रह सकते हैं। आपात स्थिति में राज्यों की सामर्थ्य के बारे में, आपात स्थिति के उद्देश्य से, मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता हूं। इसलिए, अध्यक्ष महोदय! मेरा निष्कर्ष यह है कि पर्याप्तता के विचार से, विस्तारशीलता और आपात स्थिति के विचार से, सबसे उत्तम उपाय यह है कि संघीय सरकार की वित्तीय प्रणाली के आधार को विस्तृत और व्यापक बनाया जाए। इसलिए मेरा प्रस्ताव यह है कि संघीय सरकार और प्रांतीय सरकारें, दोनों के लिए आयकर राजस्व का एक समान स्रोत समझा जाए, जिससे प्रत्येक सरकार को जब कभी कोई आवश्यकता हो, उस प्रकार के अंशदान पर निर्भर रहे बगैर, जिनका उल्लेख पैरा 21 में किया गया है, इस स्रोत का उपयोग करने का अधिकार रहे।

अब जब मैं इस पर विचार कर ही रहा हूं, तब मैं इस संबंध में भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि आयकर में प्रत्येक का अंश किस प्रकार होगा। लेकिन इससे पहले, मैं दो संकल्पनाओं को प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूं। पहली बात तो यह है कि संघ सरकार और उसकी इकाइयों के बीच - मैं खासतौर से ब्रिटिश भारत के प्रांतों के बारे में बोल रहा हूं - जिस किसी प्रकार का आवंटन परस्पर अंततः तय किया जाए, उसमें हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि प्रांतीय वित्त व्यवस्था स्वतः पूर्ण हो और यह किसी अनुदान या अंशदान पर निर्भर नहीं रहे। दूसरा, हम प्रांतीय वित्त व्यवस्था इस प्रकार की बनाएं कि यह उस उत्तरदायित्व की भावना की विरोधी नहीं हो, जो प्रत्येक कार्यकारिणी में विधान मंडल के प्रति होनी चाहिए।

अध्यक्षः क्या मैं आपकी टिप्पणियों को सही समझा हूं कि सारी प्रांतीय समस्याओं को यथाशीघ्र सुलझाना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है? प्रांतीय वित्त के बारे में जो सिद्धांत रखा, उससे मैं सहमत हूं और मेरा ख्याल है कि आपका यही आशय है कि ये सभी प्रांतीय प्रश्न जल्दी से जल्दी सुलझा लिए जाने चाहिए।