150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहे होंगे और कम प्राप्त कर रहे होंगे। ऐसे प्रांतों के लिए यह योजना और कुछ नहीं सिर्फ एक छलना होगी, जिसके तहत किसी एक प्रांत से दूसरे प्रांत के लाभ के लिए ज्यादा कर लिया जा रहा होगा।
मैं जिस प्रणाली का प्रस्ताव कर रहा हूं, उस पर वे लोग आपत्ति कर सकते हैं, जो व्यापार और उद्योग के लिए आयकर की एक समान दर के होने पर जोर देते हैं। दरों का एक समान होना निश्चय ही एक स्पृहणीय बात है और इसके महत्त्व के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कहना एक आसान बात है। भारत भी उतना ही विशाल है, जितना यूरोप। यूरोप में आयकर की दरों में एक समानता नहीं है, लेकिन तब भी वहां अन्य देशों की तरह बड़ी अच्छी तरह व्यापार और उद्योग चल रहा है। तब भारत में ऐसा क्यों न हो? इसके अलावा, जो लोग आयकर की एक समान दर होने पर जोर दे रहे हैं, वह कृपया यह बताएं कि भारत में भूमिकर के बारे में, जैसी कि इस समय स्थिति है, वह किस प्रकार अपने को चुप किए रहते हैं? इस बारे में कोई एक समानता नहीं है। बल्कि भूमिकर की ये दरें इतनी ऊंची-नीची हैं कि उन्हें देखकर बेहद हैरानी होती है। यह दरें किन्हीं दो प्रांतों में एक जैसी नहीं हैं और न किन्हीं दो प्रांतों में इन दरों की कर प्रणाली में कोई समानता है। इसलिए उप-समिति ने जिस रीति से आवंटन करने का सुझाव दिया है, उसमें संशोधन करने के लिए मैंने आयकर को जिस रूप में ग्रहण करने के बारे में, सदस्यों के प्रति पूर्ण आदर व्यक्त करते हुए, जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, उसमें उक्त प्रकार की आपत्ति नहीं की जानी चाहिए। इससे सामान्य दिनों और आपात स्थिति, दोनों ही स्थितियों की आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है।
मैंने कल एक बात कही थी। मैं अपने उस कथन को वापस लेता हूं। मैंने कहा था कि मेरी योजना वही है, जो कराधान जांच समिति ने प्रस्तावित की थी। ऐसा एक गलती के कारण भूल से हो गया। यह गलती मेरी टिप्पणियों में थी, जिन्हें मैंने बहस के लिए तैयार किया था। मुझे यह कहना चाहिए था कि उन्होंने इस पर विचार किया था, उन्होंने इसका सुझाव नहीं दिया था, हालांकि उन्हें इस बारे में कोई आपत्ति नहीं थी।
अगला विषय उप-समिति की रिपोर्ट का पैरा 12 है, जिसमें ‘कराधान’ की ‘शेष शक्तियों’ पर विचार किया गया है। उप-समिति ने यह अनुमान कर लिया है कि निर्णय इन शक्तियों को प्रांतों में निहित कर दिए जाने के पक्ष में होगा। इस आधार पर वह इस निर्णय पर पहुंची कि अनिर्धारित करों के लगाने की शक्ति इकाइयों के हाथों में होनी चाहिए। उप-समिति ने इसके लिए कोई कारण नहीं बताया है कि वह इस निष्कर्ष पर क्यों पहुंची है। लेकिन पैरा 12 में एक अंश है, जिसमें यह बताया गया है कि इस सुझाव के अलावा कोई दूसरा सुझाव देने में उप-समिति संवैधानिक आपत्ति होने का अनुभव करती है। इससे यह प्रतीत होता है कि उप-समिति का यही दृष्टिकोण है कि किसी भी संघ में कराधान की शेष शक्तियां इकाइयों में निहित होनी चाहिए। अब मेरा निवेदन है कि यह जरूरी नहीं कि संघ बनने के कारण ऐसा ही होता है। अगर आप