9. संघीय संरचना समिति - Page 170

संघीय ढांचा समिति

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कि संघीय सरकार को अपने वित्तीय संसाधनों में शामिल करने के लिए राज्यों से राजस्व की कौन-सी मद प्राप्त हुई है। मैं देखता हूं कि राज्यों द्वारा कोई भी अतिरिक्त संसाधन संघीय सरकार को नहीं दिया गया है। जहां तक सीमा शुल्क का संबंध है, स्पष्ट है कि यह राजस्व कभी भी राज्यों का राजस्व नहीं रहा जिसके बारे में उसका कोई दावा नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने इसके अधीन अपने ऊपर कोई अतिरिक्त भार नहीं लिया। जहां तक नमक के बारे में प्रश्न उठता है, यह एक ऐसा राजस्व है जिस पर खरीद के कारण भारत सरकार का अधिकार निहित है, राज्यों का नहीं। जहां तक मुद्रा लाभों का प्रश्न है, यह तो ब्रिटिश भारत के हिसाब में जाएगा। हस्तांतरित क्षेत्रों के नकद अंशदान और राजस्व का जहां तक संबंध है, यह तो केंद्रीय सरकार के राजस्व का स्रोत रहे हैं और यह स्थिति संघ के बिना भी रहती। इसलिए स्पष्ट है कि संघ में शामिल होने पर राज्य कोई ऐसी मद नहीं छोड़ेंगे, जिस पर उनका कोई अधिकार कहा जा सकता हो। मैं उनका केवल एक ही योगदान देख रहा हूं और वह है, भारत की सुरक्षा के सैन्य बल पर उनका योगदान। भारत सरकार द्वारा बनाई गई इस कमेटी की रिपोर्ट के आंकड़ों को देखने पर पता चलता है कि इस समय सेना पर राज्यों के द्वारा खर्च की जाने वाली राशि नगण्य है, अर्थात् सिर्फ 2 करोड़ और 38 लाख रुपए है।

मैंने इस रिपोर्ट में दूसरी बात जो देखनी चाही, वह यह है कि संघ के वित्तीय खर्च के बारे में प्रांतों और राज्यों की बताई गई तुलनात्मक जवाबदेही। जब मैंने इस प्रश्न पर विचार किया, तब मैंने देखा कि समानता के सिद्धांत को बिल्कुल ही हवा में उड़ा दिया गया है। कृपया आप भी इस सारी रिपोर्ट में इस असमानता पर ध्यान दें। पहली, प्रांतों को संघ सरकार के प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर, दोनों को वहन करना होगा। राज्यों को केवल प्रत्यक्ष कर वहन करना है। समिति ने इस बात पर भी जोर नहीं दिया है कि ये राज्य कंपनी कर को वहन करें। ये राज्य प्रत्यक्ष कर तो वहन करेंगे ही नहीं, बल्कि इनको ऐसे प्रत्यक्ष करों से भी छूट दे दी जाएगी, जो ये इस समय वहन कर रहे हैं, ये हैं नजराना और नकद अंशदान। दूसरी, प्रांतों को अपने यहां सीमा शुल्क लगाने की मनाही की गई है, लेकिन राज्यों के लिए इन शुल्कों को अपने यहां लगाने का हक बरकरार रखा गया है। यह इस बात के बावजूद है कि उप-समिति स्वीकार करती है कि संघ बनाने का एक उद्देश्य यह है कि सारे संघ-क्षेत्र में वाणिज्य पर कोई पाबंदी नहीं रहे। समिति इस बात को भी स्वीकार करती है कि आंतरिक सीमा शुल्क पर राज्यों का हक बने रहने से संघीय सरकार की आय पर बुरा असर पड़ेगा। तीसरी, प्रांतों को संघीय सरकार से ऋण लेने के लिए अपने राजस्व को जमानत के तौर पर रखना होगा, लेकिन राज्य दायित्व के इस बोझ से मुक्त रहेंगे, जो हालांकि संघ की वैसी ही इकाइयां हैं, जैसे कि सारे प्रांत हैं।

राज्यों को आंतरिक सीमा शुल्क रखने का जो हक बरकरार रखा गया है, उसके कारण हर कोई समझ सकता है। हम जानते हैं कि अगर उन्हें उनका अपना आंतरिक