154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शुल्क देने के लिए मजबूर किया गया, तो उनकी वित्तीय स्थिति गड़बड़ा जाएगी। लेकिन हम यह नहीं समझ पाते कि उप-समिति ने राज्यों को संघीय सरकार के प्रत्यक्ष बोझ को वहन न करने की छूट क्यों दी, न हम उन कारणों को ही समझ पाते हैं जिनसे प्रेरित होकर उप-समिति को इस बात की सिफारिश करनी पड़ी कि संघ सरकार से ऋण लेने के लिए राज्यों को अपने राजस्व को जमानत के तौर पर रखने की जरूरत नहीं है।
अध्यक्ष महोदय! समारोहों के अवसरों पर प्रांतों और राज्यों के भेद को मंजूर किया जा सकता है। हम सलामियां नहीं लिया करेंगे और इन मामलों में हम उन्हें वह सब कुछ देने के लिए तैयार हैं, जो वह चाहें। लेकिन जब धन का मामला आएगा, तो मेरा
ख्याल है कि हमें ‘कामकाज में कामकाज की बात’ वाला सिद्धांत ही अपनाना चाहिए। अगर संघ के हित में ब्रिटिश भारत त्याग कर रहा है, तब अन्य इकाइयों से संघ के हित में वैसा ही त्याग करने के लिए कहने का उसे पूरा अधिकार है। इसलिए मैं समिति की रिपोर्ट के इस भाग में निम्नलिखित संशोधन करने का अनुरोध करता हूंः
(1) राज्यों को प्रत्यक्ष कर पर संघीय सरकार का हक स्वीकार करना चाहिए। जब
तक यह नहीं होता है, तब तक नकद अंशदान का भुगतान नहीं किया जाना
चाहिए।
(2) एक ऐसी समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, जिसमें राज्यों को अपनी
वित्तीय प्रणाली में समुचित परितर्वन कर अपने आंतरिक सीमा शुल्कों को
समाप्त करना होगा, जिससे संघीय सरकार की वित्तीय प्रणाली पर कोई भी
बुरा प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
(3) संघीय सरकार से ऋणों के लिए राज्यों को अपना राजस्व जमानत के रूप
में रेहन रखना होगा।
अध्यक्ष महोदय! इस संबंध में बस मुझे यही कहना था।
अड़तीसवीं बैठक - 22 अक्तूबर 1931
मद संख्या 4
(संघीय सरकार और उसकी इकाइयों के बीच वित्तीय संसाधनों का वितरण)
संघीय वित्त उप-समिति की रिपोर्ट पर विचार
डॉ. अम्बेडकरऽः मैं एक बात कहना चाहता हूं। लॉर्ड पील ने अभी कहा कि संघीय वित्त उप-समिति की रिपोर्ट में, जो सिद्धांत दिए गए हैं, उन पर हम सबकी आम सहमति थी। अब संघीय संरचना समिति के बाकी अन्य सदस्यों की जो भी राय रही हो, मैं अपनी बात कहना चाहता हूं कि मैं निश्चित रूप से संघीय वित्त उप-समिति
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी एंड माइनॉरिटीज कमेटी, खंड 1, पृ. 685