156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. अम्बेडकरः 1900, न्यायमूर्ति श्री ब्राउन ने सर्वोच्च न्यायालय के कार्य के बारे में कहा हैः
इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अपने-अपने नागरिकों के हित के बारे में
राज्य सदियों से चिंता करते आए हैं और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के लिए
राज्यों द्वारा अक्सर लड़ाइयां लड़ी जाती रही हैं, जैसे पिछला स्वतंत्रता युद्ध, इंग्लैंड
और चीन के बीच 1840 का अफीम युद्ध और दक्षिणी अफ्रीका में इस समय
इंग्लैंड और ट्रांसवाल गणतंत्र के बीच हो रहा युद्ध, इन लड़ाइयों के उल्लेखनीय
उदाहरण हैं और इस बात को भी ध्यान में रखते हुए कि वैयक्तिक अधिकारों की
रक्षा के लिए संधियां की जाती हैं और व्यक्तिगत पक्षों के अधिकारों का समाधान
करने के लिए लगातार अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनलों की स्थापना की जा रही है, यह एक
अनोखी नियम-विरुद्ध बात होगी कि इस संघ का राज्य जिसे दूसरे राज्य के विरुद्ध
युद्ध छेड़ने का निषेध है, इस न्यायालय से ऐसे प्रतिरोध के लिए अनुरोध न करे,
जो दूसरे राज्य द्वारा उसके नागरिक और उसकी संपत्ति पर लागू किया जा चुका
है। यह प्रतिरोध, हालांकि कोई युद्ध का कार्य नहीं है, युद्ध छेड़ने के पूर्व आरंभिक
कार्रवाई के रूप में अक्सर व्यवहृत होता रहा है और इसे कुछ मामलों में युद्ध की
कार्रवाई को उचित सिद्ध करने के लिए यथेष्ट कार्रवाई समझा जाता है।
वह आगे कहते हैं कि बहुत से ऐसे मामले हैं, जो किसी संघ में उठ सकते हैं और जिनका निर्णय संघ के अभाव में कूटनीति या युद्ध के माध्यम से किया जाता है। इसलिए ऐसे विनाश से बचने के लिए संघीय न्याय-व्यवस्था को इस बात के लिए संघीय न्यायालय के व्यापक कार्यक्षेत्र का प्रावधान करना होगा, जिससे इन सभी मामलों में न्याय किया जा सके। अध्यक्ष महोदय! इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए मेरा ख्याल है कि आपने संघीय न्यायालय के कार्यक्षेत्र के संबंध में जिस योजना की रूपरेखा समिति को संबोधित करते हुए कल अपने भाषण में बताई थी, क्षमा करें, वह बहुत अपर्याप्त थी।
कल आपने जो विचार व्यक्त किए, उनके अनुसार न्यायिक शक्ति का विस्तार ऐसे मामलों के लिए किया जाएगा, जो संघ और उसकी विभिन्न इकाइयों के बीच होंगे, राज्य बनाम राज्य, प्रांत बनाम राज्य, भारतीय कॉमनवेल्थ बनाम राज्य या प्रांत होंगे। मैं यह नहीं जानता कि यहां ‘राज्य’ शब्द का प्रयोग किसी निगमित निकाय के लिए या न्यासी, संरक्षक या नागरिकों के प्रतिनिधि के रूप में हुआ है। इसके अलावा, मेरा ऐसा विचार है कि संघीय न्याय-व्यवस्था को ऐसे मामलों के लिए भी प्रावधान करना चाहिए, जो किसी इकाई और दूसरी इकाई के नागरिक के बीच हों। एक उदाहरण लीजिए, कल्पना कीजिए कि कोई भारतीय राज्य, जो संघ की एक इकाई बन जाती है, कुछ रकम कल्पित ऋण बोर्ड से खुला बाजार में ऋण के रूप में लेती है। यह भी कल्पना कीजिए कि बंबई प्रांत में रहने वाला कोई नागरिक उस ऋण के लिए अंशदान करता है और