संघीय ढांचा समिति
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जैसा संघीय संविधान बना रहे हैं, उन सभी विरोधों के साथ जो हम कर रहे हैं, एक संघीय संविधान नहीं बन रहा है। हमारा संघ, ब्रिटिश भारत, जिसमें सभी लोकप्रिय और प्रतिनिधि संस्थाएं हैं और भारतीय राज्यों, जहां कोई भी लोकप्रिय और प्रतिनिधि संस्थाएं नहीं हैं, को मिलाकर बन रहा है। मैं सिर्फ कल्पना कर रहा हूं। संभवतः इसके उल्टे परिणाम होंगे और अगर ऐसा हुआ तो कोई भी मुझसे ज्यादा खुश नहीं होगा। लेकिन हमारे सामने ऐसी ही स्थिति होगी, अर्थात् यह संघीय लोकतंत्र और अधिनायकवाद के बीच होगा। और मैं कहता हूं कि हम ब्रिटिश भारत में राजनीतिक बहुसंख्यकों की सरकार न बनाकर ऐसी सरकार बना रहे होंगे, जो मुख्यतः सांप्रदायिक बहुसंख्यकों की होगी। इसलिए मेरा मानना है कि मूल अधिकारों की सुरक्षा का प्रश्न और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा का प्रश्न भारत में कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जितना कि वह किसी और संविधान में हो सकता है और मूल अधिकारों को, चाहे वे जो भी हों, और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को, ये भी चाहे जो भी हों, सुरक्षित रखना परम कर्तव्य बन जाता है। इसे पूरा करने के लिए मुझे जो सबसे अच्छा उपाय दीखता है, वह यह है कि हम संघीय न्यायालय को ऐसा कार्यक्षेत्र प्रदान करें कि वह इनसे संबद्ध सभी मामलों की सुनवाई कर सके। यह मेरा निवेदन है। मूल अधिकारों या अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने से संबंधित प्रश्न, चाहे जहां भी उठें, चाहे ब्रिटिश भारत में या भारतीय राज्यों में, संघीय न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में होने चाहिए, जिससे वह उनकी सुनवाई कर सके।
अध्यक्षः क्या आप वाणिज्यिक भेदभाव के मामले भी शामिल करना चाहेंगे?
डॉ. अम्बेडकरः जी हां, अगर हम सभी इस बात पर सहमत हों कि यह एक मूल अधिकार ही है कि किसी भी प्रकार का वाणिज्यिक भेदभाव नहीं होगा, तब इसे संघीय न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में रखा जाना चाहिए। संघीय न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र के बारे में बस इतना ही कहना है।
मैं जिस अगले विषय पर कहना चाहता हूं, वह संघीय न्यायालय के निर्णयों को कार्यान्वित करने के बारे में है। अध्यक्ष महोदय! आपने जो टिप्पणी कृपापूर्वक परिचालित की है, उसमें संघीय न्यायालय के निर्णयों को कार्यान्वित किए जाने के बारे में कुछ भी कानूनी उपाय नहीं सुझाए गए हैं। मैं समझता हूं कि यह प्रश्न विभिन्न राज्यों और विभिन्न प्रांतों पर छोड़ा जा रहा है और आप शायद यह संकेत करना चाहते हैं कि हमें प्रांतों या राज्यों की सदाशयता पर अविश्वास नहीं करना चाहिए तथा हमें यह मान लेना चाहिए कि वे संघीय न्यायालय के निर्णयों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे और उन्हें लागू करेंगे। अध्यक्ष महोदय! मैं सोचता हूं कि हमें इस आदर्श का अनुसरण करना चाहिए, जो हमें जॉन स्टुअर्ट मिल ने बताया है कि अगर सभी व्यक्ति अच्छे होते, तब कानूनों को बनाने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती। लेकिन चूंकि हम जानते हैं कि कुछ