160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यक्ति खराब हैं, इसलिए हमें कानून बनाने पड़ते हैं। इसलिए मेरा विचार है कि हमें यह मामला अधर में नहीं छोड़ देना चाहिए। मेरा यह मत अमरीका में संघीय न्यायालय के अनुभव के कारण दृढ़ हो गया है। मैं समिति का ध्यान सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के कार्यान्वयन के इतिहास की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं। मैं सबसे पहले आपका ध्यान चिशोम बनाम जार्जिया वाले मामले की ओर आकृष्ट कर रहा हूं, जिसका निर्णय 1793 में हुआ था। संघीय न्यायालय ने अपने अधिकार-क्षेत्र के अनुसार, जो उस समय उसे मिले हुए थे, कुछ ऋण जार्जिया नाम के राज्य से वसूल करने के लिए चिशोम के पक्ष में निर्णय दिया। लेकिन जैसा कि इतिहास से पता चलता है, जार्जिया राज्य सर्वोच्च न्यायालय के विरोध में उठ खड़ा हुआ और उसने इस निर्णय को इसलिए मानने से अस्वीकार कर दिया कि यह प्रभुसत्तासंपन्न राज्य के लिए एक चुनौती स्वरूप है और तब अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अधर में लटका रहा, यह कार्यान्वित नहीं हो सका। यह मामला इतना तूल पकड़ गया कि जार्जिया राज्य के इस रवैए के कारण 11वां संशोधन हुआ। इस संशोधन के फलस्वरूप अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय को एक राज्य और दूसरे राज्य के नागरिकों के बीच के विवाद के बारे में जो अधिकार दिए गए थे, वे वापस ले लिए गए। ऐसा ही एक अन्य उदाहरण वर्जीनिया बनाम पश्चिमी वर्जीनिया का है। युद्ध के बाद वर्जीनिया का पुराना राज्य दो भागों में बांट दिया गया, वर्जीनिया और पश्चिमी वर्जीनिया। ऐसा 1861 में हुआ और इस समझौते के अंग के रूप में पश्चिमी वर्जीनिया पहली जनवरी 1861 से पहले पुराने राज्य द्वारा अदा किए गए सार्वजनिक ऋण का एक उचित अंश चुकाने पर राजी हुआ। इस दायित्व की पुनः पुष्टि पश्चिमी वर्जीनिया के संविधान के 8वें अनुच्छेद में की गई। वर्जीनिया ने यथाशक्ति मैत्रीपूर्ण रीति से पश्चिमी वर्जीनिया को इस रकम का भुगतान करने के लिए कहा, लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। 1906 में वर्जीनिया यह मामला अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय में ले गया। पश्चिमी वर्जीनिया ने इस मामले में सबसे ज्यादा अड़ंगे डाले। वह सबसे पहले 1906 से 1911 तक सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार को स्वीकार करने से मना करता रहा। लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय किया कि वह उसके अधिकार-क्षेत्र में आता है, तब सर्वोच्च न्यायालय ने सारे खातों की जांच करने और इस बारे में एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए एक न्यायाधीश नियुक्त किया। रिपोर्ट तैयार की गई, लेकिन तब पश्चिमी वर्जीनिया ने इस रिपोर्ट को चुनौती देते हुए तीन वर्ष बिता दिए। इसके बाद उसके द्वारा यह मामला उसकी विधान सभा में यह विचार करने के लिए ले जाया गया कि क्या उक्त दायित्व स्वीकार किया जाए। यह मामला 1913 तक चला। इसके बाद उसने रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद उस पर अपना पूरक लिखित उत्तर देने के लिए समय मांगा। आपत्ति रद्द की गई। जब अड़चन डालने के सभी उपाय निष्फल हो गए, तब 1915 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय दिया। चार वर्षों तक पश्चिमी वर्जीनिया उस निर्णय पर विचार करने के लिए मना करता रहा और 1919 में ही उसे ऋण अदा करने के लिए राजी किया जा सका।