संघीय ढांचा समिति
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कार्य कर रहे हैं कुछ मामलों में संघीय दायित्व का निर्वाह करने के लिए चुना जाना चाहिए। मैं सोचता हूं कि इसके बहुत ही महत्त्वपूर्ण परिणाम होंगे। पहली बात तो यह है कि इससे राज्यों के न्यायालयों की प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी और दूसरी बात यह है कि इससे राज्यों के न्यायालयों का संबंध भारत की संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था से हो जाएगा और हमारा संघ एक वास्तविक संघ बन जाएगा।
श्री जयकरः सर्वोच्च न्यायालय अर्थात् संघीय न्यायालय में अपील करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
डॉ. अम्बेडकरः मैं इसी विषय पर आ रहा हूं। इस बारे में मेरा सुझाव है कि राज्यों को ऐसे मामलों में भी जिनका संबंध संघीय कार्यक्षेत्र से नहीं है, अपनी अपीलें संघीय सर्वोच्च न्यायालय को भेजने की सहमति देनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करते हैं, तब मेरा सुझाव है कि हमें वही मुक्त नीति अपना लेनी चाहिए, जो ऑस्ट्रेलियाई संविधान में अपनाई हुई है। ऑस्ट्रेलियाई संविधान में यह प्रावधान है कि संघीय न्यायालय या वहां के उच्च न्यायालयों को राज्यों से प्राप्त अपीलों को सुनने से रोका नहीं जाएगा। मैं चाहता हूं कि यह प्रावधान हमारे अपने संविधान में अपना लिया जाए। हो सकता है कि हम राज्यों के न्यायालयों को अपनी-अपनी अपीलें संघीय न्यायालय को भेजने के लिए बाध्य न करें, लेकिन अगर बाद में राज्य अपने-अपने न्यायालयों की अपीलें संघीय न्यायालय को भेजेंगे तब हमें संघीय उच्च न्यायालय को अपीलें सुनने से रोकना चाहिए। जैसा कि मैंने कहा, मैं फिर ऑस्ट्रेलियाई संविधान में दिए गए मॉडल को अपनाऊंगा और राज्यों को अपने-अपने यहां के न्यायालयों द्वारा संघीय न्यायालय को अपीलें भेजने के उनके अधिकार को विनियमित करने का अधिकार दूंगा। वे अपील करने का यही अधिकार नहीं देंगे - क्योंकि वे ब्रिटिश प्रांतों से जुड़े होंगे। अगर वे चाहें, तो उसे विनियमित कर सकते हैं।
इसके अलावा एक और बात मैं कहना चाहता हूं। यह संघीय सरकार के साथ उच्च न्यायालय के संबंध के बारे में है। इस समय कलकत्ता उच्च न्यायालय को छोड़कर सभी भारतीय न्यायालय वित्त और प्रशासन दोनों मामलों में प्रांतीय हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय निश्चय ही वित्त के लिए प्रांतीय है, लेकिन प्रशासन के मामले में केंद्रीय है। माननीय तेज बहादुर सपू्र ने कल यह सुझाव दिया कि भारतीय उच्च न्यायालय सभी प्रांतों में प्रशासन के मामले में केंद्रीय और वित्तीय प्रयोजन के लिए प्रांतीय होने चाहिए। जहां तक माननीय तेज बहादुर सपू्र का यह सुझाव है कि इन्हें प्रशासन के लिए केंद्रीय होना चाहिए, मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूं। लेकिन इसके लिए मेरे कारण कुछ जुदा हैं और मैं उन्हें कहना चाहता हूं। उन्होंने कहा है कि भारतीय प्रांतों के न्यायाधीशों के मन में यह घबराहट है कि उन पर स्थानीय राजनीतिक दबाव पड़ सकता है, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें स्थानीय राजनीति से उठाकर संघीय नियंत्रण में रख दिया जाए। अब मैं सोचता हूं कि किसी भी देश में जहां पर प्रतिनिधि आधारित लोकतंत्र और उत्तरदायी सरकार है, हमारे उच्च न्यायालय दलगत राजनीति या राजनीतिज्ञों के प्रभाव से बच नहीं सकते।