168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय तेज बहादुर सपू्रः मैं सोचता था कि कानून का सिद्धांत यह है कि ब्रिटिश न्यायालय दलगत राजनीति से अलग होते हैं।
डॉ. अम्बेडकरः इस देश में कुछ न्यायिक पद ऐसे हैं, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि इन पर राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं। लेकिन यह एक अलग मामला है। मैं इस समिति के सम्मुख विचारार्थ यह रखना चाहता हूं कि हम संघ में लगभग 562 भारतीय राज्यों को शामिल कर रहे हैं।
श्री जिन्नाः क्या आप ऐसा कर रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकरः मेरा अनुमान है कि ऐसी ही योजना है। कम से कम हमने अपने सम्मुख यही आदर्श रखा है कि सभी देशी राज्य इस संघ में शामिल होंगे। मैं समझता हूं कि इस बारे में कोई मतभेद नहीं है कि बहुत से ऐसे राज्य जो भारतीय संघ में आएंगे, वे वित्तीय दृष्टि से इतने समर्थ नहीं हैं कि अपने लिए सक्षम न्याय-प्रबंध की व्यवस्था कर सकें। मैं बंबई प्रेसिडेंसी का एक उदाहरण दे रहा हूं। बंबई में एक छोटा-सा राज्य है। इसका प्रशासन एक महिला के हाथों में है। इस राज्य में, जहां तक मुझे मालूम है, सिर्फ एक अधिकारी है। वह सिविल जज के रूप में कार्य करता है। वह मजिस्ट्रेट के रूप में भी काम करता है और सेशन जज के रूप में भी काम करता है। वह अपीलें राज्य प्रमुख के पास भेजता है और उसकी एक दीवान सहायता करता है, जहां तक मैं जानता हूं, वह एक सेवानिवृत्त राजस्व अधिकारी है। बहुत से पेचीदा मामले इस ट्रिब्यूनल के पास सुनवाई के लिए आते हैं, जिसे उस राज्य की प्रिवी काउंसिल कहा जाता है और इस तरह जो न्यायालय वहां गठित है, वही निर्णय देता है। अब मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं देता। ध्यान देने की बात यह है कि यह राज्य इतना छोटा है कि इसके पास इतना राजस्व नहीं कि वह अपने यहां किसी सक्षम न्यायालय की स्थापना कर सके।
फिर, एक बात और विचार करने की है कि हम ब्रिटिश भारत में भी नए-नए प्रांत इतने छोटे बनाते चले जाएं कि वे भी वित्तीय दृष्टि से अपने यहां एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था न कर सकें। ऐसा आज भी हो रहा है। असम प्रांत अपने यहां एक उच्च न्यायालय नहीं रख सकता। यह बंगाल प्रेसिडेंसी में स्थित उच्च न्यायालय की सहायता से अपना काम चलाता है। मेरा निवेदन यह है कि हम स्थिति को इस तरह सुधारें कि अगर वे उचित न्याय-प्रबंध की व्यवस्था नहीं कर सकते, तो उनको अपने यहां के लोगों के दीवानी और फौजदारी के मामलों में उन उच्च न्यायालयों की सेवा लेने की अनुमति दें, जो ब्रिटिश भारत में स्थित हैं, तो ऐसी योजना का स्वागत किया जाना चाहिए। यह एक तथ्य है कि जब एक प्रांतीय उच्च न्यायालयों पर संबंधित प्रांतीय सरकार का एकमात्र नियंत्रण रहेगा, तब तक ये राज्य जिनकी उस प्रांत के मामलों को नियंत्रित करने में कोई साझेदारी नहीं है, प्रांतीय उच्च न्यायालय की सेवाओं का उपयोग करने में कोई रुचि नहीं लेंगे। दूसरी ओर, यदि प्रांतीय उच्च न्यायालय केंद्र के नियंत्रण में कर दिए जाएं, जहां इन राज्यों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीति से प्रतिनिधित्व रहेगा, तब इन राज्यों को अपने यहां के लोगों के दीवानी