10. अल्पसंख्यक समिति - Page 194

अल्पसंख्यक समिति

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डॉ. अम्बेडकरः धन्यवाद, लेकिन जिस स्थिति में इस समय मैं जानना चाहता हूं क्या इस प्रस्तावित समिति में मेरे या मेरे सहयोगी को काम करना कुछ भी लाभप्रद होगा और इसी कारण श्री गांधी ने पहले दिन ही जब वह संघीय संरचना समिति में बोले थे, हम सबको यह बता दिया था कि इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रतिनिधि की हैसियत से वह मुसलमानों और सिखों को छोड़कर किसी भी समुदाय को राजनीतिक मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। वह एंग्लो इंडियन, दलित वर्ग और भारतीय ईसाइयों को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। मैं सोचता हूं कि मैं इस समिति के सम्मुख अगर यह बता दूं, तो शिष्टाचार का कोई उल्लंघन नहीं होगा कि जब मुझे श्री गांधी के एक सप्ताह पूर्व मिलने और उनके साथ दलित वर्गों के प्रश्न पर विचार विमर्श करने का सौभाग्य मिला और जब हम लोगों को अन्य अल्पसंख्यक वर्गों के सदस्य के रूप में उनसे कल दफतर में मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, तब उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में यह बता दिया कि उन्होंने संघीय संरचना समिति में, जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, वह उनका पूर्ण और सुविचारित दृष्टिकोण है। मैं जो बात कहना चाहता हूं वह यह है कि जब तक मैं यह जान नहीं लूं कि भारत के भावी संविधान में दलित वर्गों को एक ऐसे समुदाय के रूप में, जो राजनीतिक मान्यता के अधिकारी होते हैं, मान्यता मिलनी है, तब तक मैं नहीं जानता कि इस समस्या पर विचार करने के लिए महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित इस विशेष समिति में शामिल होकर मैं कुछ कार्य कर भी सकूंगा। इसलिए जब तक मुझे यह आश्वासन नहीं मिल जाए कि यह समिति यह मानकर काम शुरू करेगी कि जिन समुदायों को अल्पसंख्यक उप-समिति ने भारत में मान्यता दिए जाने के योग्य समझा है, वे सभी समुदाय इसमें शामिल किए जाएंगे, तब तक मेरे लिए यह कहना मुश्किल है कि मैं पूरे हृदय से स्थगन के प्रस्ताव पर अनुमोदन करता हूं या मैं उस समिति के साथ पूरे हृदय से सहयोग कर सकता हूं, जो नामजद की जाने वाली है। मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता था।

माननीय हेनरी गिडने (आंग्ल भारतीय)ः जिस समुदाय का प्रतिनिधि होने का मुझे गौरव मिला है, उस समुदाय की और अपने मित्र डॉ. अम्बेडकर के दृष्टिकोण से मैं पूरी तरह सहमत हूं। एक पृथव्Q समुदाय के रूप में श्री गांधी द्वारा अस्वीकृत किए जाने के कारण मेरी भी एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। मैं गलती पर हो सकता हूं। अगर ऐसा है, तो मुझे विश्वास है कि श्री गांधी मुझे सही कर देंगे। कल जब हम इस मामले को लेकर श्री गांधी से मिले, तब उन्होंने मेरे मन पर जो छाप डाली, उससे मुझे कोई शक नहीं रह गया कि एक संप्रदाय के रूप में वह और कांग्रेस हमें मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं और कांग्रेस के लाहौर प्रस्ताव से जो लगभग श्री गांधी के संकेत पर पारित हुआ था, यह साफ पता चलता है कि केवल दो संप्रदायों - मुसलमानों और सिखों - को ही मान्यता देना संभव होगा और यह निर्णय और ऐतिहासिक कारणों से लिया गया है। लेकिन मैं श्री गांधी से फिर कहता हूं कि वह इस बैठक में इस कमेटी के बनने