178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से पहले और इससे पहले कि आप बैठक स्थगित करें, यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दें कि इस कमेटी में उन संप्रदायों के प्रतिनिधियों को शामिल करेंगे, जिन्हें इस समिति ने पहले मान्यता दे रखी है।
राव बहादुर पन्नीर सेलवम (भारतीय ईसाई)ः डॉ. अम्बेडकर ने जो कुछ कहा वह मेरे लिए एक नई बात है। मैं अब तक नहीं मानता था कि महात्मा गांधी जी हम लोगों को कोई मान्यता नहीं देने जा रहे हैं। अगर ऐसा है तब मेरा निवेदन है कि यहां हमारा होना बहुत ही जरूरी है। चूंकि राजनीतिक भविष्य में एक संप्रदाय के रूप में हमें कोई मान्यता नहीं दी गई है, इसलिए मैं सचमुच यही सोचता हूं कि आगे, जो भी कमेटी बनेगी उसमें हमारे भाग लेने से कोई लाभ नहीं होगा। मेरे ख्याल से मुझे उसी रीति से अपनी बात कहनी चाहिए, जिस रीति से डॉ. अम्बेडकर और माननीय हेनरी गिडने ने अपनी बात प्रस्तुत की है।
डॉ. मुंजेः जब मैंने अखबारों में पढ़ा कि महात्मा गांधी अल्पसंख्यक समिति में सिर्फ दो संप्रदायों को मान्यता देंगे, तब मैंने इस बात को कोई ज्यादा महत्त्व नहीं दिया और इसे बहुत ही गंभीर बात समझा। मैंने सोचा कि शायद यह समाधान और समझौते की प्रक्रिया को आसान बनाने और कठिनाइयां कम करने की दृष्टि से किया जा रहा है। लेकिन डॉ. अम्बेडकर के भाषण और माननीय हेनरी गिडने के भाषण से लगता है कि उन्होंने इसे बहुत ही गंभीरता से ग्रहण किया है। इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं और समिति के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूं कि पंजाब और बंगाल के प्रांतों में हिन्दू भी अल्पसंख्यक हैं और उन्हें भी अपने-अपने हितों की रक्षा करनी है। इस संक्षिप्त स्पष्टीकरण के बाद मुझे इस प्रश्न पर विचार करने के लिए बैठक के स्थगित किए जाने में कोई आपत्ति नहीं है।
माननीय मोहम्मद शफीः मुझे ऐसा लगता है कि महात्मा गांधी ने जो प्रस्ताव रखा है, उसके बारे में हमारे कुछ दोस्तों के मन में कुछ गलतफहमी है। जहां तक इस प्रस्ताव को मैं समझ सका हूं, महात्मा गांधी ने इस समिति की न कोई उप-समिति और न अलग से ही कोई समिति बनाने की बात कही है। इसमें जो बात कही गई है, वह यह है कि इस पूरी समिति में शामिल प्रत्येक वर्ग जिसमें दलित वर्ग और आंग्ल भारतीय समुदाय भी शामिल है, अपने एक या दो या तीन प्रतिनिधियों को चुनेंगे, जो परस्पर मिलेंगे और परस्पर विचार-विनिमय कर इस बात पर विचार करेंगे कि क्या कोई ऐसा समझौता हो सकता है, जो सबको स्वीकार हो और इस प्रकार कुल मिलाकर अल्पसंख्यक समिति के काम के बोझ को हल्का करे। अगर यह कामयाबी हासिल हो जाती है, तब मुझे यकीन है कि भारत की शांतिपूर्वक प्रगति चाहने वाला हर व्यक्ति इस लक्ष्य को पूरा करने में अपना सहयोग देना चाहेगा। मुझे ऐसा लगता है कि डॉ. अम्बेडकर ने जो आपत्ति की है, वह महात्मा गांधी द्वारा पेश किए गए और माननीय आगा खां द्वारा समर्थित प्रस्ताव