10. अल्पसंख्यक समिति - Page 197

180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मुझे देंगे, मैं यह जानना चाहता हूं कि वह कौन-सा सवाल है, जिस पर यह समिति विचार करेगी? क्या वह सिर्फ मुसलमान बनाम हिन्दू प्रश्न पर विचार करेगी? क्या यह पंजाब में मुसलमान बनाम सिख प्रश्न पर विचार करेगी? या यह सिख बनाम हिन्दू प्रश्न पर विचार करेगी? क्या यह ईसाई, आंग्ल भारतीय और दलित वर्ग के सवाल पर विचार करेगी?

अगर हम शुरू में ही यह स्पष्ट रूप से समझ लें कि यह समिति न सिर्फ हिन्दुओं और मुसलमानों के, हिन्दुओं और सिखों के प्रश्न पर विचार करेगी, बल्कि यह दलित वर्ग, आंग्ल भारतीयों और ईसाइयों के प्रश्न पर भी विचार करने का दायित्व लेती है, तब मैं इस स्थगन प्रस्ताव को बिना किसी विरोध के पारित किए जाने के लिए खुशी से तैयार हूं। लेकिन मैं यह बता देना चाहता हूं कि अगर मुझे अलग-थलग कर रखा जाएगा और अगर इस स्थगन अवधि का इस्तेमाल हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न और हिन्दू-सिख को सुलझाने के निमित्त किया जाएगा, तब मैं इस बात पर जोर दूंगा कि यह समिति तुरंत इस सवाल पर विचार करे, बजाए इसके कि कोई दूसरा इस समस्या को हल करने की कोशिश करे।

श्री गांधीः प्रधानमंत्री जी और मित्रो! मैं देखता हूं कि हममें से कुछ लोगों ने जिस काम को करने का लक्ष्य बनाया है, उसके बारे में कुछ भ्रांति है। डॉ. अम्बेडकर, कर्नल गिडने और मेरे दूसरे दोस्त इस बात को लेकर नाहक परेशान हैं कि यह क्या होने जा रहा है। मैं कौन होता हूं, जो भारत में किसी क्षेत्र, किसी बिरादरी या किसी भी अकेले आदमी को राजनीतिक दर्जा देने से मना कर दूं। अगर मैं किसी भी राष्ट्रीय क्षेत्र के हितों की उपेक्षा करने का दोषी पाया जाता हूं, तो कांग्रेस का नुमाइंदा होने की वजह से मैं उसके विश्वास का पात्र नहीं रह जाता हूं। मैंने निश्चय ही इन मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि मेरी धारणा भी यही है। लेकिन हर क्षेत्र के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के अलग-अलग उपाय हैं। इस अनौपचारिक कांफ्रेंस या बैठक के किसी भी सदस्य को अपने दृष्टिकोण से अवगत कराने पर कोई रोक नहीं होगी। हमें इसे समिति नाम देने की कोई जरूरत नहीं। मुझे कोई बैठक आयोजित करने या किसी समिति को गठित करने का कोई अधिकार नहीं है। मैं शांति का सिर्फ एक विनम्र संदेशवाहक बनकर काम कर सकता हूं। मैं सिर्फ यह कोशिश कर सकता हूं कि जुदा-जुदा क्षेत्रों और वर्गों के प्रतिनिधि आपस में मिलें, एक जगह बैठें और दिल खोल कर बात करेगे। हो सकता है कि हम ऐसा कर गलतफहमी दूर न कर सकें, लेकिन हमें अपना लक्ष्य साफ दिखाई देने लगेगा, जो अब तक धुंधला दिखाई दे रहा है।

मेरे ख्याल में किसी को इस बात से डरने की कोई जरूरत नहीं कि कोई क्या कह रहा है और उसके क्या विचार हैं मेरी बात का उतना ही वजन होगा जितना कि दूसरे की बात का है, उसका कोई ज्यादा वजन नहीं होगा। मेरे पास कोई ऐसा अधिकार नहीं है कि मैं दूसरे की राय के खिलाफ अपनी बात को ही रखूं। मैंने देश हित में अपनी राय बताई और जब भी मौका आएगा, मैं इन्हीं विचारों को रखूंगा। यह आप पर निर्भर करता