182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कोई आशा नहीं है। मुझे इस बात का भी संतोष है कि मैंने हल निकालने के लिए हर संभव कोशिश की। लेकिन अगर मैं यह कहूं कि बातचीत का नाकामयाब होना हमारे लिए शर्म की बात है, तो इससे पूरी सच्चाई व्यक्त नहीं होती। हममें से प्रायः सभी लोग उस दल या वर्ग के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हैं, जिनके हम प्रतिनिधि कहे जाते हैं। हम यहां सरकार द्वारा नामजद होने की वजह से हैं। हम लोग ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, सर्वसम्मत हल पाने के लिए जिनकी यहां पर होने की भारी जरूरत थी। इसके अलावा, कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दें कि अभी अल्पसंख्यक समिति की बैठकें बुलाने का कोई उचित समय नहीं था। यह असलियत भी नहीं है, क्योंकि हम यह निश्चित रीति से नहीं जानते थे कि इस बातचीत के बाद हमें क्या मिलने वाला है। अगर हम निश्चित रूप से यह जानते होते कि जो कुछ हम चाहते हैं, हमें मिल जाएगा तब हम बातचीत को कलह की टोकरी में डालने से पहले दो बार अवश्य सोचते। यह ऐसा ही था कि मानों हमें बताया गया हो। इस बातचीत से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना मौजूदा प्रतिनिधि द्वारा सांप्रदायिक समस्या का सर्वसम्मत हल निकालने की योग्यता पर निर्भर करता है। यह समाधान स्वराज के संविधान का मुकुट तो बन सकता है, उसकी नींव नहीं बन सकता। ऐसा इसलिए हो गया है कि हमारे मतभेद स्थायी हो गए हैं और अगर वह पैदा नहीं हुए हैं तो इसकी वजह विदेशी हुकूमत है। मुझे इस बात में तनिक भी शक नहीं कि सांप्रदायिक मतभेदों का हिमशैल स्वतंत्रता के सूरज का ताप पाकर पिघल जाएगा।
मैं इसलिए यह सुझाव देने की धृष्टता कर रहा हूं कि अल्पसंख्यक समिति को अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित कर दिया जाए और संविधान के मूल-भूत सिद्धांतों को जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी तय कर दिया जाए। इस बीच सांप्रदायिक समस्या का अनौपचारिक रूप से कोई वास्तविक समाधान ढूंढने का काम जारी रहेगा और जारी रहना चाहिए। इस कारण संविधान के बनाने के काम को रुकने देना नहीं चाहिए। हमें इस तरफ से ध्यान हटा लेना चाहिए और संरचना के मुख्य भाग के निर्माण पर सारा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
आखिरी बात यह है कि इस विचार-विमर्श में मेरे भाग लेने की सिर्फ एक ही वजह है कि मैं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधि हूं। मुझे इसकी स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए। आपको जो कुछ दिखाई देता है, खासतौर से इंग्लैंड में, उसके उल्टे कांग्रेस सारे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है। यह निश्चित रूप से लाखों गूंगे लोगों का प्रतिनिधि होने का भी दावा करती है, जिनमें ढेर सारे अस्पृश्य शामिल हैं, जिन्हें दलित कहने के बजाए कुचला ज्यादा गया है और वे लोग भी शामिल हैं, जो एक तरह से बहुत ही अभागे और उपेक्षित हैं और जिन्हें पिछड़ा वर्ग कहा जाता है।
ऐसा कहा गया लगता है कि मैं विधान-मंडल में अस्पृश्यों का कोई भी प्रतिनिधित्व दिए जाने के खिलाफ हूं। यह असलियत से उल्टी बात है। मैंने जो कुछ कहा और जिसे