अल्पसंख्यक समिति
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जाने के लिए उत्सुक नहीं हैं। उनकी स्थिति साफ शब्दों में यदि बताई जाए, तो यह है कि हम सत्ता का हस्तांतरण नहीं चाहते। लेकिन अगर ब्रिटिश सरकार इन शक्तियों को दबाने में असमर्थ है, जो देश में सत्ता के हस्तांतरण के लिए हो-हल्ला मचाए हुए हैं - और हम जानते हैं कि दलित वर्गों के लोग इन शक्तियों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं - तब हमारा निवेदन है कि अगर आप यह हस्तांतरण करते हैं, तब इस हस्तांतरण के साथ ऐसी शर्त और ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि सत्ता किसी गुट, किसी अल्पतंत्र, कुछ लोगों के वर्ग के हाथों में नहीं आ जाएगी, वो चाहे मुसलमान हो या हिन्दू, बल्कि इसका समाधान ऐसा होगा कि इस सत्ता में सारे समुदायों की अपने-अपने अनुपात के अनुसार साझेदारी होगी। इसलिए, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि जब तक मुझे यह पता न चल जाए कि मेरी या मेरे समुदाय की स्थिति क्या है, तब तक मैं इस संघीय संरचना समिति के विचार-विमर्श में किस प्रकार कोई दायित्वपूर्ण भाग ले सकता हूं।
श्री गांधीः अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों के बारे में एक बात और है। मैं अन्य अल्पसंख्यकों के द्वारा उठाए गए दावों को समझ सकता हूं, लेकिन अस्पृश्य लोगों की तरफ से किए जाने वाले दावे रह जाते हैं, जिनकी सभी बेरहमी के साथ उपेक्षा करते आए हैं। इसका मतलब है कि हमने उन्हें हमेशा के लिए बदनसीब बना दिया है। मैं अस्पृश्यों के जीने से अधिकार को नहीं छीनूंगा, चाहे यह भारत के लिए आजादी हासिल करने की शर्त ही क्यों न हो। मैं खुद को असंख्य अस्पृश्यों का नुमाइंदा कहता हूं। यहां मैं सिर्फ कांग्रेस की ओर से ही नहीं, बल्कि अपनी ओर से बोलता हूं और मेरा दावा है कि अगर अस्पृश्यों का मत लिया जाएगा, तब उनके सबसे ज्यादा मत मेरे पक्ष में होंगे और मैं देश में एक कोने से दूसरे कोने तक यह बताने का काम करूंगा कि अस्पृश्यता के इस कलंक को पृथक निर्वाचन पद्धति और पृथक आरक्षण से दूर नहीं किया जा सकता, जो उनके लिए नहीं, बल्कि कट्टठ्ठर हिन्दुओं के लिए शर्म की बात है।
मैं चाहता हूं कि यह समिति और सारी दुनिया इस बात को समझे कि आज हिन्दू सुधारवादियों की एक जमात है, जो अस्पृश्यता के इस कलंक को मिटाने के लिए कृत संकल्प हैं। हम अपने कागजों में जनसंख्या के आंकड़ों में अस्पृश्यों को एक पृथक वर्ग के रूप में ही नहीं चाहते। सिख हमेशा सिख के रूप में रहें, इसी तरह मुसलमान और यूरोपियन भी। क्या अस्पृश्य हमेशा अस्पृश्य रहेंगे? अगर अस्पृश्यता रहेगी, तब मुझे डर है कि कहीं हिन्दुत्व न खत्म हो जाए। इसलिए मैं डॉ. अम्बेडकर के प्रति और उनकी इच्छा के प्रति कि अस्पृश्यों का उद्धार हो और उनकी योग्यता के प्रति पूरे आदर के साथ अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह कहना चाहता हूं कि उन्होंने जिन अत्याचारों को झेला है और उन्हें जो कड़वे अनुभव हुए हैं, उनके इस निर्णय की पृष्ठभूमि में यही काम कर रहे हैं। मुझे यह कहते हुए दुःख होता है। लेकिन अगर मैं यह सब न कहूं तब मैं