186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अस्पृश्यों के हितों के प्रति निष्ठावान नहीं रहूंगा, जो मुझे अपनी जिंदगी से भी ज्यादा प्यारे हैं, अगर मैं कुछ न बोलूं कि मैं सारे संसार के स्वामित्व के लिए भी उनके अधिकारों के साथ कोई सौदेबाजी नहीं करूंगा। मैं यह बात पूरे उत्तरदायित्व के साथ कह रहा हूं और मैं यह कहता हूं कि जब डॉ. अम्बेडकर भारत के सारे अस्पृश्य की बात कहते हैं, तब उनका यह कहना उचित नहीं है कि उनके वही एक मात्र प्रतिनिधि हैं। ऐसा कहने अथवा करने से हिन्दुत्व बंट जाता है, ऐसा करने से मुझे कोई खुशी नहीं होगी। अगर अस्पृश्य लोग इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं, तब मैं कर भी क्या सकता हूं। मुझे यह सब बर्दाश्त करना होगा। लेकिन अगर गांवों में घर बंट सकते हैं, तब ऐसा हिन्दुत्व किस काम का? मैं इसे सहन नहीं कर सकता। जो लोग अस्पृश्यों के लिए राजनीतिक अधिकार की बातें करते हैं, वे लोग अपने भारत को नहीं समझते, वे यह नहीं समझते कि आज भारतीय समाज की स्थिति कैसी है। इसलिए मैं अपने पूरे जोर के साथ कहना चाहता हूं कि अगर इसकी मुखालफत मुझे अकेले ही करनी पड़ी, तब मैं सारी जिंदगी इसकी मुखालफत करता रहूंगा।