पूर्ण अधिवेशन
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नहीं थी और उसके कारण हमारे विचारों में इतना गंभीर परिवर्तन नहीं आता। स्थिति का गहन विश्लेषण कर हम यह जान गए हैं कि यह केवल उपेक्षा का मामला नहीं है, बल्कि इस कार्य को करने के लिए उनमें बिल्कुल भी काबलियत नहीं है। दलित वर्गों ने देखा है कि भारत में अंग्रेजी सरकार के सामने दो बड़ी गंभीर सीमाएं हैं। पहली आंतरिक सीमा है, जो सत्तारूढ़ लोगों के चरित्र, उद्देश्य और हितों के द्वारा पैदा हुई है। बात यह नहीं है कि ऐसा करना उनके चरित्र, उद्देश्य और हितों के विरुद्ध है। बाहरी विरोध के भय से ही वह हमारी सहायता नहीं कर रहे है। भारत सरकार उन सामाजिक बुराइयों को दूर करने की आवश्यकता को समझती है, जो भारतीय समाज को घुन की तरह खाए जा रही हैं, जिनके कारण दलित वर्ग अनेक वर्षों से अभिशप्त जीवन जीने को विवश हैं। भारत सरकार जानती है कि जमींदार जनता का खून चूस रहे हैं ओर पूंजीपति कामगारों को जीवनयापन के लिए उचित मजदूरी नहीं दे रहे हैं तथा उनके लिए काम की बेहतर स्थिति भी पैदा नहीं करते हें। बड़े दुःख की बात है कि सरकार ने इन बुराइयों को दूर करने का साहस नहीं दिखाया। इसका कारण क्या है? क्या इन बुराइयों को दूर करने के लिए उसके पास कानूनी शक्ति का अभाव है? नहीं, यह बात नहीं है। इसका कारण यह है कि उसे भय है कि वर्तमान सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन करने से उसका विरोध होगा। ऐसी सरकार जनता के लिए किस काम की है? इन दो सीमाओं के पाटों में फंसी सरकार दलित वर्गों की स्थिति में सुधार करने और उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं कर सकती। हमें ऐसी सरकार चाहिए, जिसमें सत्ता में बैठे व्यक्ति देश के हित में अविभाजित राज्यनिष्ठा प्रदान करेंगे। हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें सत्ता में बैठे व्यक्ति इस बात को समझते हों कि कब सरकार की आज्ञाकारिता समाप्त हो जाती है और प्रतिरोध आरंभ हो जाता है, फिर वे न्याय और समय की आवश्यकताओं को देखते हुए सामाजिक और आर्थिक जीवन की आचार संहिताओं में परिवर्तन करने में नहीं हिचकिचाएं। अंग्रेजी सरकार यह भूमिका कभी नहीं निभा सकेगी। यह कार्य केवल वही सरकार कर सकती है, जो जनता की सरकार हो, जनता के लिए हो, तथा जनता द्वारा चुनी गई हो।
दलित वर्गों की ओर से उठाए गए यह कुछ प्रश्न हैं और उनकी दृष्टि में उन प्रश्नों के ये उत्तर हैं। इसलिए दलित वर्ग इस अनिवार्य निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भारत की नौकरशाह सरकार सदाशय के बावजूद हमारी तकलीफों को दूर करने के लिए किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं ला सकती। हम महसूस करते हैं कि हमारे अतिरिक्त हमारे दुःख-दर्द को कोई भी दूर नहीं कर सकता और जब तक राजनीतिक शक्ति हमारे हाथों में नहीं आती, हम भी उसे दूर नहीं कर सकते। जब तक अंग्रेजी सरकार बनी रहेगी, तब तक इस राजनीतिक सत्ता का अंश मात्र भी हमें मिलने वाला नहीं। स्वराज्य के अंतर्गत ही हमें राजनीतिक सत्ता में साझेदारी का कोई अवसर मिल सकता है, राजनीतिक सत्ता के बिना हमारे लोगों का उद्धार संभव नहीं है।