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भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त
समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य
डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा परीक्षित
साक्षीगण
यूरोपीय लोक सेवकों, भारतीय पुलिस संघ और सिविल इंजीनियर्स एसोसिएशन की ओर से माननीय पैट्रिक जेम्सफगन, के.सी.आई.ई., सी.एस.आई., एफ.आर.ए.एस., श्री ई.बी. लवलक, श्री विल्फ्रेड हेराल्ड शूबर्ट, श्री यूसटेस आर्थर सिसिल किंग, श्री हेनरी रोबर्ट ह्नरोप, श्री फ्रेडरिक वाइने रॉबर्टसन, माननीय ईवान्स काटन, श्री हेराल्ड लान्सलोट न्यूमेन और श्री सेल
382. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः कुछ ही देर पहले आपने कहा था कि भारतीय प्रेस और भारत के राजनीतिज्ञों का रवैया भारतीय पुलिस सेवा के प्रति बहुत ज्यादा विरोधी है?
माननीय पी.जे. फगनः हां।
383. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं माननीय रोनाल्ड क्रे्यस्त्रोक द्वारा लिखित कार्यवृत्त में से एक छोटा-सा उद्धरण आपको पढ़कर सुनाना चाहूंगा, जो ली आयोग रिपोर्ट, पृष्ठ 132, पैरा 10 में नीचे से कुछ पंक्तियों से पहले लगा है। मैं जिस पैरा की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं, वह यह हैः
जिन लोगों ने हमारे समक्ष साक्ष्य दिया है, उनमें से अनेक का यह विश्वास है कि
नए विधान-मंडलों द्वारा समय-समय पर प्रदर्शित विरोध पूर्णतया इस तथ्य की वजह
से पैदा हुआ है कि अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्य उन पर बाहर से थोपे जाते
हैं, और इन सेवाओं के लिए नई भर्ती इन निहित स्वार्थों को अनिश्चित काल तक
बढ़ाती रहेगी_ किंतु एक बार हस्तांतरित क्षेत्र में नियंत्रण, भारत मंत्री, भारत सरकार
या स्थानीय शासन के हाथ में चला जाए, तो सारा विद्वेष और शत्रुता विलुप्त हो
जाएगी।
मैं जानना चाहता हूं, क्या आप इस कथन से सहमत हैं?
ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-क, 13 जून 1933, पृ. 69-70