6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महोदय, मैं एक बात की ओर आपका विशेष ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। मैंने दलित वर्गों का पक्ष प्रस्तुत करते समय डोमिनियन स्टेटस शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया। मैंने इस शब्दावली का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया कि मैं उसका अभिप्रायः नहीं समझता और न ही इसका यह अर्थ है कि दलित वर्ग भारत को डोमिनियन स्टेटस दिए जाने के विरोधी हैं। इस शब्दावली का इस्तेमाल न करने के पीछे मेरा मुख्य उद्देश्य यह है कि दलित वर्ग क्या चाहते हैं, इसको उसका संप्रेषण नहीं हो पाता। दलित वर्ग भारत के लिए सुरक्षोपायों सहित डोमिनियन स्टेटस चाहते हैं, किंतु इस प्रश्न पर वे बल देना चाहते हैं कि डोमिनियन भारत का कैसे संचालन किया जाएगा? राजनीतिक सत्ता का केंद्र कहां होगा? यह सत्ता किसके हाथों में होगी? क्या दलित वर्ग उसके वारिस होंगे? उनके लिए यह विचारणीय प्रश्न है। दलित वर्ग यह अनुभव करते हैं कि जब तक नए संविधान की निर्मात्री राजनीतिक मशीनरी विशिष्ट प्रकार की नहीं होगी, दलित वर्गों की राजनीतिक सत्ता में रत्ती भर भी साझेदारी नहीं होगी। नए संविधान का निर्माण करते समय भारत की सामाजिक व्यवस्था के कुछ ठोस तथ्यों को ध्यान में अवश्य रखा जाना चाहिए। इस बात को मानकर चलना होगा कि यहां की सामाजिक व्यवस्था उच्च वर्ग के लिए आदर और निम्न वर्ग के लिए घृणा की अन्याय-परक मान्यताओं पर आधारित है। इसलिए वर्ग और जाति पर आधारित इस व्यवस्था में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए आवश्यक समता और बंधुत्व की मानवीय भावनाओं के विकास की कोई संभावना नहीं है। इस बात को भी मानना होगा कि यद्यपि बुद्धिजीवी भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है, किंतु यह सभी उच्च वर्ग से आते हैं, यद्यपि यह देश-हित की बात करते हैं और राजनीतिक आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं, किंतु वे जातिगत संकीर्णताओं का परित्याग नहीं कर पाते। दूसरे शब्दों में, दलित वर्ग यह चाहते हैं कि राजनीतिक तंत्र ऐसा हो, जो समाज के मनोविज्ञान के अनुकूल हो। अन्यथा आप एक ऐसे संविधान का निर्माण करेंगे, जो चाहे कितना ही संतुलित क्यों न हो, वह एक विकृत संविधान होगा और जिस समाज के लिए उसे बनाया जाएगा, उसके लिए उपयुक्त नहीं होगा।
इस विषय पर अपनी बात समाप्त करने से पहले मैं एक बात और कहना चाहता हूं। हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि दलित वर्गों की समस्या एक सामाजिक समस्या है और उसका समाधान राजनीति में नहीं है। हम इस विचार का जोरदार विरोध करते हैं। हम यह महसूस करते हैं कि जब तक दलित वर्गों के हाथ में राजनीतिक सत्ता नहीं आती, उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यह सत्य है और हमारे विचार में इसके अलावा और कुछ सत्य हो ही नहीं सकता कि दलित वर्गों की समस्या मुख्य रूप से एक राजनीतिक समस्या है और उसे ऐसा ही माना जाना चाहिए। हम जानते हैं। कि राजनीतिक सत्ता अंग्रेजों के हाथ से निकल कर ऐसे लोगों के हाथों में जा रही है, जिनका हमारे जीवन पर अत्यधिक आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक प्रभुत्व है। हम