भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
प्राप्त होगा।
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- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मान लीजिए, किसी परिसंघीय विधान से उत्पन्न वाद हेतुक से कोई विवाद पैदा होता है तो अंतिम न्याय मंच जहां मूल वाद दायर किया जा सकता है निश्चय ही संघीय न्यायालय होना चाहिए। क्या हम सबसे पहले मूल मुकदमें अर्थात् स्वयं वाद पर दृष्टिपात न करें?
मीर मकबूल महमूदः इसमें स्पष्टतः यह परिकल्पित है कि वाद यथास्थिति ब्रिटिश भारत में अथवा देशी राज्य में दायर किया जाएगा। अब हम अपील के सवाल पर आते हैं।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः लेकिन वाद क्या इतना बृहत हो सकता है कि अधिकारिता स्वयं फेडरल न्यायालय की भी हो सकती है?
मीर मकबूल महमूदः मैं ऐसा नहीं समझता।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं आपका ध्यान जिस बात की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं, वह यह है कि पैरा 155 में उल्लिखित उपबंधों में किसी नागरिक के लिए ऐसा कोई उपबंध नहीं है, जिससे कि किसी देशी राज्य के विरुद्ध फेडरल विधान से उत्पन्न अपने अधिकारों की रक्षा कर सके अथवा प्रांत का नागरिक किसी भारतीय प्रांत के खिलाफ अपने अधिकारों की रक्षा कर सके।
मीर महबूल महमूदः प्रकटतः।
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- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या आप कृपया अपने ज्ञापन दस्तावेज 21 के पैरा छः के उप पैरा (ग) को देखेंगे?
मीर मकबूल महमूदः हां।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इस पैरा के अंत में आपने सुझाव दिया है कि यदि कोई देशी राज्य विशेष संघीय न्यायालय के न्याय निर्णय को प्रवर्तित करने में असफल रहता है, तो क्या वायसराय को ऐसा कराने की शक्तियां दी जाएं?
डॉ. पी.के. सेनः हां।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आप यह शक्ति वायसराय को ही क्यों देना चाहते हैं, गवर्नर जनरल अथवा परिसंघीय मंत्री परिषद को क्यों नहीं? संघीय न्यायालय परिसंघीय संविधान का अंग है।
डॉ. पी.के. सेनः यदि कोई रियासत फेडरल न्यायालय के किसी आदेश विशेष का पालन नहीं करती है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वायसराय वह समुचित व्यक्ति है, जो यह देखे कि इसका पालन किया जाए।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः वायसराय क्यों? गवर्नर जनरल या संघीय मंत्रिपरिषद क्यों नहीं? वायसराय ही क्यों?