11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 228

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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श्री के.एम. पणिक्करः बिल्कुल ठीक।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या मैं यह समझ लूं कि आपको यह कहना है कि यदि देशी राज्य अगली बार जब चर्चा के लिए प्रश्न उत्पन्न हो यह मान लें कि सेना हस्तांतरित विषय नहीं होनी चाहिए तो वह हस्तातंरित नहीं होगी?

श्री के.एम. पणिक्करः अनुमानतः ऐसा है।

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माननीय माइकल ओ डायर, जी.सी.आई.ई., के.सी.एस.आई.

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः आपके साक्ष्य में मैंने देखा कि आपने बौद्धिक वर्ग अथवा बुद्धिजीवी वर्ग और सामान्य जनता के बीच बहुत सूक्ष्म अंतर किया है। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या आप उस स्थिति में जब वह बुद्धिजीवी, जो आपके दिमाग में है समाज के किसी खास वर्ग से आएं और उस स्थिति में जिसमें वे बुद्धिजीवी समाज के विभिन्न वर्गों से आएं कोई अंतर करेंगे?

माननीय माइकल ओ डायरः हां, मेरा विचार है कि यदि वे विभिन्न वर्गों से आएं, तो उनका दृष्टिकोंण व्यापक होगा।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या आप समझते हैं कि भारत में वर्तमान परिस्थितियों में बुद्धिजीवी वर्ग वस्तुतः एक समिश्रण वर्ग है, जिसमें केवल ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि ब्राह्मणों से भिन्न जातियों के लोग-मुस्लिम, दलित वर्गों के लोग भी हैं।

माननीय माइकल ओ डायरः भारत के विभिन्न हिस्सों में इसमें बहुत भिन्नता है। उत्तर भारत में बुद्धिजीवी वर्ग विशेषतः पंजाब के बाहर हिंदू हैं और वे सवर्ण जाति के हिंदू हैं। मद्रास में जहां शिक्षा का बहुत अधिक प्रचार-प्रसार रहा है, स्थिति भिन्न है। अतः इसका सामान्यीकरण करना बहुत कठिन है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं जो आपके सामने मुद्दा रखना चाहता हूं, वह इस प्रकार है। मुझे विश्वास है कि आप यह नहीं कहेंगे कि यदि बुद्धिजीवी वर्ग भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों के हैं, तो उनके और जनसमूह के बीच वही विभाजन होगा, जो उस स्थिति में होगा, जब बुद्धिजीवी वर्ग किसी एक वर्ग से ही संबंधित हों?

माननीय माइकल ओ डायरः मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं, ऐसा नहीं होगा।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इसलिए मैं सोचता हूं कि तार्किक दृष्टि से इसका अभिप्राय यह होगा कि ऐसी बुद्धिजीवी वर्ग से उस जन-समूह की देख-रेख करने का विश्वास किया जा सकता है, जिसमें से वे स्वयं आए हैं?

माननीय माइकल ओ डायरः मैं ऐसा सोचता हूं, वे ऐसा करेंगे। यही ज्यादा संभाव्य

ऽमिनिट्स आफ एविडेन्स, खंड 2-क, 29 जून 1933, पृ. 406-7