पूर्ण अधिवेशन
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चाहते हैं कि सत्ता का हस्तांतरण हो, चाहे स्वराज्य का विचार अतीत में हम पर किए गए जुल्म, अत्याचार और अन्याय की याद दिलाता हो। और हो सकता है कि स्वराज्य प्राप्ति के पश्चात् हमें पुनः उन जुल्मों और अत्याचारों का शिकार होना पड़े। हम इस आशा पर यह खतरा भी उठाने के लिए तैयार हैं कि अपने देशवासियों के साथ-साथ हमें भी राजनीतिक सत्ता में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलेगा। उसे हम एक ही शर्त पर स्वीकार करेंगे कि हमारी समस्याओं के समाधान में विलंब नहीं किया जाएगा, क्योंकि हमने किसी चमत्कार के होने की पहले ही लंबी प्रतीक्षा की है। जब-जब अंग्रेजी सरकार ने सरकार में और प्रतिनिधित्व देने के लिए कदम उठाए हैं, हर बार दलित वर्गों को जान-बूझकर छोड़ दिया गया है। राजनीतिक सत्ता में उनके दावे पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया। मै। इस बात का पुरजोर विरोध करता हूं और अब हम इसे और सहन नहीं करेंगे। सामान्य राजनीतिक समझौते के साथ ही हमारी समस्या का समाधान किया जाना चाहिए और उसे भावी शासकों की सहानुभूति और सद्भावना की बालू पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। दलित वर्ग इस बात पर क्यों जोर दे रहे हैं, इसके स्पष्ट कारण हैं।
यह सर्वविदित है कि जिस व्यक्ति के पास होती है, वह उस व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ताकतवर होता है, जिसके पास यह नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि जिनके पास सत्ता होती है, वे उनके पक्ष में यह सत्ता छोड़ने के लिए कभी तैयार नहीं होते, जो सत्ता के बाहर होते हैं। अतः हमें आशा नहीं है कि हमारी सामाजिक समस्या का समाधान होगा। आज हम जिन्हें सत्ता और सम्मान के सिंहासन पर आरूढ़ करने के लिए सहायता कर रहे हैं, उन्हें हटाने के लिए हमें एक और क्रांति करनी होगी, तभी सत्ता हमारे हाथों में आ सकेगी। अपनी सुरक्षा के लिए अत्यधिक विश्वास कर बरबाद हो जाने के बदले अपनी दुशि्ंचताओं और आशंकाओं के कारण हमसे कोई घृणा करे, हम इसे अधिक पसंद नहीं करेंगे। इस बात पर बल देना उचित है कि हमारी समस्या के समाधान के लिए एक ऐसा अनुकूल राजनीतिक तंत्र हो, जिससे हमारा भी उस पर कुछ अधिकार हो। हम उनकी इच्छा पर निर्भर नहीं रह सकते, जो उस तंत्र पर अपना निरंकुश अधिकार जमाने के लिए जोड़-तोड़ कर रहे हैं।
दलित वर्ग अपनी सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किस प्रकार का राजनीतिक तंत्र चाहते हैं, इसके बारे में मैं अधिवेशन को उचित समय पर बताऊंगा। इस समय मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि यद्यपि हम एक उत्तरदायी सरकार चाहते हैं, किंतु हम ऐसी सरकार नहीं चाहते जिसमें केवल शासक बदल जाएं। यदि कार्यपालिका को उत्तरदायित्वपूर्ण बनाना है, तो विधायिका को वस्तुतः पूरी तरह एक प्रतिनिधि संस्था बनाया जाना होगा।
अध्यक्ष महोदय, खेद है कि मुझे अपनी बात इतने स्पष्ट शब्दों में कहनी पड़ी है। इसका कोई विकल्प नहीं था। दलित वर्गों का कोई मित्र नहीं है। सरकार ने अपना