1. पूर्ण अधिवेशन - Page 25

8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अस्तित्व बनाए रखने के लिए अभी तक उनका इस्तेमाल किया है। हिंदू उन पर अपना दावा उनको अधिकारों से वंचित करने अथवा यों कहना चाहिए उनके अधिकारों को हड़पने के लिए करते हैं। मुसलमान उनके पृथक अस्तित्व को इसलिए मान्यता नहीं देते, क्योंकि उनको भय है कि एक प्रतिद्वंद्वी को शामिल करने से उनके अधिकार कम हो जाएंगे। सरकार द्वारा दबाए, हिंदुओं द्वारा सताए और मुसलमानों द्वारा उपेक्षित दलित वर्ग बिल्कुल ऐसी निस्सहाय एवं दयनीय स्थिति में हैं, जिसकी कोई मिसाल नहीं है और इसकी ओर मुझे आपका ध्यान आकर्षित करना पड़ा।

चर्चा के लिए रखे गए एक अन्य प्रश्न के बारे में मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस विषय को एक सामान्य बहस के साथ जोड़ दिया गया है। यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि इस पर बहस के लिए एक सत्र की आवश्यकता है। सरसरी उल्लेख से इस विषय के साथ न्याय नहीं हो सकता। यह ऐसा विषय है, जिसमें दलित वर्गों की गहरी रुचि है और वे इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय मानते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षोपायों के रूप में हम चाहते हैं कि बहुसंख्यकों के कुशासन से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार को प्रांतीय बहुसंख्यकों पर प्रभावी अंकुश लगाना चाहिए। भारतीय होने के नाते भारतीय राष्ट्रवाद में मेरी गहरी रुचि है, मैं यह स्पष्ट तौर पर कह देना चाहता हूं कि एकात्मक शासन प्रणाली में मेरा अटूट विश्वास है और इसमें किसी प्रकार के विघ्न की बात मुझे विचलित कर देती है। भारतीय राष्ट्र के निर्माण में एकात्मक शासन प्रणाली की जबरदस्त भूमिका रही है। एकीकरण की प्रक्रिया, जो एकीकृत शासन प्रणाली के कारण आरंभ हुई, अभी तक पूरी नहीं हुई है और निर्माण काल में और इस प्रक्रिया के पूरी होने से पहले इस शक्तिशाली प्रणाली को समाप्त करना अनुचित होगा।

तथापि, जिस रूप में इस प्रश्न को प्रस्तुत किया गया है, उसका मात्र एक सैद्धांतिक महत्व है और यदि यह सिद्ध कर दिया जाए कि स्थानीय स्वायत्तता एकात्मक शासन प्रणाली के प्रतिकूल नहीं है, तो मैं संघीय शासन प्रणाली पर विचार करने के लिए तैयार हूं।

महोदय, दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में उनकी ओर से मुझे जो कहना था, मैंने कह दिया है। भारतीय होने के नाते मैं आपकी अनुमति से एक-दो शब्दों में यह बताना चाहता हूं कि हम किस स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस संबंध में इतनी बातें कही गई हैं कि उसकी गंभीरता के संबंध में मैं आगे कुछ नहीं कहना चाहता, यद्यपि मैं इस आंदोलन का मूक दर्शक नहीं हूं। इस संबंध में मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या हम समस्या के समाधान के लिए सही दिशा में जा रहे हैं? उसका समाधान केवल इस पर निर्भर करेगा कि ब्रिटिश प्रतिनिधि मंडल के सदस्य क्या रुख अपनाते हैं? मैं उनसे केवल यही कहना चाहूंगा कि यह उन्हें तय करना है कि समस्या का समाधान समझौते से करना है अथवा बल प्रयोग से, क्योंकि यह केवल उन्हीं की जिम्मेदारी है।