11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 244

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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ग 75. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इस प्रकार वास्तव में घरों में की जाने वाली जांच-पड़ताल के आधार पर की जाने वाली आपत्ति नहीं उठ पाएगी। घरों में जांच-पड़ताल करना आपत्तिजनक हो सकता है।

माननीय फिलिप हार्टोगः मैं यह कहना चाहूंगा कि मुझे सीधे उस मुद्दे के संबंध में भारत मंत्री के दोनों उत्तरों के प्रति निर्देश करना समुचित मुद्दा प्रतीत होता है, जो डॉ. अम्बेडकर ने उठाया है। प्रश्न 7437 के उत्तर में भारत मंत्री ने कहा थाः ‘भविष्य में लड़कियों या स्त्रियों की भावी सन्तानों के लिए भी निर्वाचन प्रयोजन के लिए आपके शिक्षा संबंधी रजिस्टरों और विवरणियों को अपनाना अधिक आसान होगा। किन्तु उन प्रांतों में जहां ऐसा अब तक नहीं किया गया है, पहले निर्वाचन में ऐसा करने में काफी कठिनाई होगी।’ अब मैं यह बताना चाहूंगा कि आप इसे भारत मंत्री के पृष्ठ 817 पर प्रश्न 7214 के दूसरे उत्तर के साथ पढ़ें जिसमें उन्होंने कहा है, ‘दस वर्ष तक कोई परिवर्तन नहीं होगा।’ सेल्सबरी के मारक्वेस के प्रश्न के उत्तर में उनका सुझाव है कि संसद के अधिनियम में वह कहेंगे कि दस वर्ष तक मताधिकार में कोई तब्दीली नहीं हो सकती। परिणामस्वरूप, दूसरे, तीसरे या चौथे निर्वाचनों के लिए रजिस्टर रखने का कोई लाभ नहीं होगा, यदि दूसरे, तीसरे और चौथे निर्वाचन दस वर्ष की अवधि के भीतर ही होते हैं। अब हम संख्या के प्रश्न पर आएं। साक्षर स्त्रियों की कुल संख्या लोथियन रिपोर्ट में अनुमानतः साढ़े बारह लाख बताई गई है। यह रिपोर्ट के पृष्ठ 86 पर है। उनमें से 3 लाख 45 हजार मद्रास में हैं, जिनके बारे में कोई कठिनाई नहीं है। इसके बाद शेष भारत के लिए अपेक्षाकृत संख्या कम रह जाती है और वह है 8 लाख 75 हजार। अब यदि यह सम्भव है कि 3 लाख 45 हजार मद्रासी स्त्रियों को निर्वाचन की मतदाता सूची में रखा जाए और किसी न किसी समय जरूर करना होगा, तो यह संभव क्यों नहीं है कि 8 लाख 75 हजार स्त्रियां शेष भारत के लिए मतदाता सूची में रखी जाएं।

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अखिल भारतीय महिला सम्मेलन तथा दो अन्य महिला संघों की ओर से

राजकुमारी अमृत कौर और श्रीमती हामिद अली

ग 334. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः क्या आपका कहना है कि मुसलमान घरों के बारे में कोई कठिनाई नहीं होगी?

श्रीमती हामिद अलीः मुसलमानों को अपनी पत्नी का नाम लेने में कभी कोई एतराज नहीं होता, जैसा कि माननीय हरी सिंह गौड़ ने कहा है, कुछ नजाकत की भावना होती है, लेकिन कई मुसलमानों में अपनी पत्नियों का नाम लेने में कोई कठिनाई महसूस करने की बात कभी भी सामने नहीं आई। यह सच है कि स्त्रियां अपने पति का नाम बार-बार नहीं लेतीं, लेकिन कभी-कभार तो लेती ही हैं।

ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ग, 26 जुलाई 1933, पृ. 2314-21