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पूर्ण अधिवेशन

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जो बल प्रयोग करना चाहते हैं और जिन्हें विश्वास है कि इससे स्थिति सुधरेगी, मैं उन्हें राजनीतिक-दर्शन के महान विद्वान एडमंड बर्क के स्मरणीय शब्दों की याद दिलाना चाहता हूं। जब अंग्रेजी राष्ट्र अमरीकी उपनिवेशों की समस्या का सामना कर रहा था, तो उन्होंने कहा थाः

बल प्रयोग से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होता है, यह नीति थोड़ी देर

के लिए तो सफल हो सकती है, किंतु इससे पुनः दमन की जरूरत समाप्त नहीं

होती। जिस राष्ट्र को बार-बार जीतना पड़े उस पर शासन नहीं किया जा सकता।

दमन से अनिश्चय की स्थिति समाप्त नहीं होती। दमन से हमेशा आतंक पैदा नहीं

होता और शस्त्र और सेना से विजय नहीं होती। यदि आप सफल नहीं होते, तो कोई

विकल्प शेष नहीं रहता। समझौते की कोई आशा नहीं बचती। सत्ता और प्राधिकार

कभी-कभी दयालुता दिखाकर प्राप्त किए जा सकते हैं, किंतु उन्हें निरुपाय और

पराजित हिंसा द्वारा भिक्षा के रूप में कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता। शक्ति के

बल पर समस्या के समाधान के विरुद्ध यह भी आपत्ति है कि उससे जिस चीज को

सुरक्षित करने के प्रयास किए जाते हैं, वह विकृत हो जाती है। जनता की वफादारी

को जीतने के लिए लड़ाई की जाती है। वह प्राप्त नहीं होती, अपितु हाथ लगती

है निंदा, अवज्ञा, विनाश।

आप सभी जानते हैं कि यह कितनी मूल्यवान और अच्छी सलाह थी। आपने इस सलाह को माना नहीं और इसके लिए आपको अमरीका महाद्वीप से हाथ धोना पड़ा। आपने जब इसे माना, तो उससे आपका भला हुआ। शेष डोमीनियन आपके साथ हैं। जो लोग समझौते की नीति अपनाना चाहते हैं, उनसे मैं एक बात कहना चाहता हूं। एक ऐसी धारणा बन गई है कि प्रतिनिधि मंडलों के सदस्यों को यहां डोमीनियन स्टेटस के पक्ष और विपक्ष में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है और जिस पक्ष का पलड़ा भारी होगा, डोमीनियन स्टेटस देना अथवा न देना उस पर निर्भर करेगा। जो लोग तर्क-वितर्क के लिए तैयार हो रहे हैं, मै। उनसे पूरे आदर के साथ निवेदन करना चाहता हूं कि इस विषय पर तर्क के सूत्र के आधार पर निर्णय करने से बड़ी और कोई भूल नहीं हो सकती। मेरा तार्किकों के साथ कोई झगड़ा नहीं है, किंतु मैं उन्हें चेतावनी देना चाहता हूं कि यदि वे अपने निष्कर्षों के लिए सही तर्कों का चयन नहीं करेंगे, तो निश्चय ही उसके विनाशकारी परिणाम होंगे। मुझे भय है कि इस बात को पूरी तरह से महसूस नहीं किया जा रहा है कि देश की वर्तमान मानसिकता को देखते हुए ऐसा कोई संविधान सफल नहीं होगा, जो अधिकांश जनता को मान्य न हो। वह दिन चले गए, जब आप जैसा भी निर्णय लेते थे, भारत उसे मान लेता था। अब वह समय कभी वापस नहीं आएगा। यदि आप चाहते हैं कि आपका संविधान मान्य हो, तो आप उसे तर्क पर नहीं, जनता की सहमति के आधार पर बनाएं।