भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
संभव है?
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श्रीमती एल. मुखर्जीः मैं ऐसा नहीं समझती। स्त्री होने के नाते स्त्रियां स्वभावतः ऐसी सांप्रदायिक भावनाओं से मुक्त होती हैं।
ग 589. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः उदाहरण के लिए, आज नौकरियों और वृत्तिक नियुक्तियों के लिए संघर्ष या खींचातानी वस्तुतः पुरुषों तक ही सीमित है?
श्रीमती एल. मुखर्जीः हां।
ग 590. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः ज्यादातर इसलिए कि भारत में महिलाएं परिवार की कमाऊ सदस्या नहीं होतीं?
श्रीमती एल. मुखर्जीः आपकी बात मैं अच्छी तरह समझती हूं।
ग 591. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः अतः शिक्षा के मामले को ही लें, यदि पुरुषों के साथ-साथ महिलाएं भी शिक्षा के फलस्वरूप अथवा आपके अपने विश्लेषण के अनुसार, इस पेशे में और अन्य पेशों में आ जाएं, तो कदाचित यह चीज उनमें भी आ जाएगी?
श्रीमती एल. मुखर्जीः बहुत संभव है। मैं इस सवाल का उत्तर तब तक नहीं दे सकती, जब तक कि हम परिणाम न देख लें।
ग 592. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं यह मुद्दा आपके सामने रखना चाहता था?
श्रीमती एल. मुखर्जीः मैं यह महसूस करती हूं कि भविष्य में जब हमारी महिलाएं व्यवसायों में जाने की स्थिति में हो जाएंगी, तो सांप्रदायिकता की मनोभावना ही समाप्त हो जाएगी, मैं ऐसी आशा करती हूं।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं भी ऐसी आशा करता हूं।
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ग 610. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः श्रीमती सेन, मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं, आपने संघ के निचले सदन में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के बारे में अपने विचार स्पष्ट किए हैं और आपने श्वेत-पत्र में अप्रत्यक्ष चुनाव के लिए किए गए उपबंध पर अपनी आपत्ति व्यक्त की है?
श्रीमती पी.के. सेनः हां।
ग 611. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः प्रांतीय विधान-मंडलों में स्त्रियों के प्रतिनिधित्व के लिए किए गए उपबंध के बारे में मैंने आपके विचार कहीं नहीं देखे हैं, न सिवाए उनके जो आपने साधारणतया व्यक्त किए हैं कि आप ऐसा कोई उपबंध पसंद नहीं करेंगी, जो संप्रदायवाद का रक्षक हो?
श्रीमती पी.के. सेनः हां।
ग 612. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या इस बारे में आपको कोई सुझाव देना है?
ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2ग, 29 जुलाई 1933, पृ. 2355