11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 255

238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ग 622. अध्यक्षः मेरा विचार है कि दोपहर बाद का उपयोग साक्षियों से जानकारी प्राप्त करने के लिए करना बेहतर होगा। क्या आप मुद्दे पर वापस आएंगी?

श्रीमती पी.के. सेनः कम से कम यह स्त्रियों का पृथक निर्वाचक-मंडल नहीं होगा।

ग 623. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः यदि यह आप पर छोड़ दिया जाए, तो उन्हें सारे 6 या उससे भी अधिक स्थान दे सकती हैं?

श्रीमती पी.के. सेनः ठीक।

ग 624. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरा अभिप्राय है कि आशंका की दृष्टि से हो सकता है, एक भी न हो?

श्रीमती पी.के. सेनः हां।

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पूना समझौते पर संयुक्त समिति में विचार-विमर्श

माननीय एन.एन. सरकारऽः क्या मैं संक्षिप्त बयान दे सकता हूं, ताकि मामले को सीमित किया जा सके? यदि समिति इजाजत दे, तो मैं सांप्रदायिकता के फैसले पर प्रश्न पूछने का अधिकार चाहता हूं। किन्तु वास्तव में हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद से संबंधित मैं कोई प्रश्न नहीं पूछना चाहता, क्योंकि वह उन तथ्यों पर निर्भर नहीं करता, जिन्हें किन्हीं साक्षियों द्वारा साबित किया जाना है। लेकिन मैं साक्षियों से यह चाहता हूं कि वे महोदय को पूना समझौते से संबंधित तथ्य बताएं। माननीय अन्नुप पात्रो के द्विविधापूर्ण बयान के बारे में मुझे दो बातें कहनी हैं और मुझे अपनी बात कहने की अनुमति दी जाए। उस फैसले से ही यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि एक प्रांत का परिणाम किसी दूसरे प्रांत के परिणाम से संबद्ध नहीं होता। उस फैसले में ही यह कहा गया है कि किसी एक प्रांत से भली-भांति भिन्न दूसरे प्रांत में कोई भी परिवर्तन किया जा सकता है। जहां तक मेरे मित्र श्री जफरुल्ला खां के बयान का संबंध है, मैं केवल यह निवेदन करने का यत्न करूंगा कि गोलमेज सम्मेलन के समय हम यह ढूंढने का प्रयत्न कर रहे थे कि करार का सबसे बड़ा उपाय क्या है? हमारे लिए यह कहने के लिए रास्ता खुला था, जब तक मुझे हिंदुओं के लिए 100 प्रतिशत स्थान नहीं मिल जाते, मैं इसमें और आगे भाग नहीं लूंगा। यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं है। मैं समिति से अनुरोध करूंगा कि इस प्रश्न के गुणावगुण पर विचार किया जाए।

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या मैं संक्षेप में कुछ कह सकता हूं? मुझे खुशी है कि यह खींचातानी, यदि इस शब्द का प्रयोग करने की इजाजत हो, तो केवल पूना समझौते तक ही सीमित होने जा रही है और माननीय नृपेन्द्र सरकार हिंदू और मुसलमानों के बीच स्थानों के वितरण के प्रश्न को फिर से उठाना नहीं चाहते, लेकिन क्या मैं कह सकता हूं कि मुसलमानों के दृष्टिकोण के बारे में चौधरी जफरुल्ला खां द्वारा व्यक्त की गई भावनाएं बिल्कुल वही हैं, जो कि मैं शुरू से व्यक्त कर रहा हूं। जब मैंने