भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
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बनिक शाह महिष्य स्वीकृत रूप से दलित वर्ग से बाहर। इंग्लैंड से आए भारतीय, ब्रह्म समाजी लोग यहां तक कि बैद्य, कायस्थ भी ब्राह्मणों के मुकाबले में। बंगाल सार्वजनिक जीवन जात-पांत से मुक्त, सवर्ण हिंदुओं ने मदारीपुर से 1923 में चटर्जी के खिलाफ एक नामशूद्र को चुना। देशबन्धु ने ब्राह्मण की पुत्री से शादी करके रूढि़वादी निष्ठा की अवहेलना की, किन्तु उनके अनुयायियों में सभी सवर्ण जातियों के लोग। कलकत्ता गजट 14 जुलाई के अनुसार नामशूद्रों के वितरण से उनके लिए 20 सुरक्षित स्थान पाना सुनिश्चित। गैर-नामशूद्र भविष्य से चिंतित। नामशूद्र राजवंशी कड़े रुख से अन्य दलित जातियों को सामाजिक संसर्ग से अलग रखते हैं और सवर्ण जाति के लोगों की अपेक्षा जिन्होंने अपने उत्थान के लिए पीढि़यों तक काम किया, उनका प्रतिनिधित्व करने का कम अधिकार। पूना समझौते से बंगाल के हिंदुओं का राजनीतिक विभाजन शुरू, जो अब तक नहीं था। प्रधानमंत्री को दिखा दें।’
- चटर्जी और अन्य
मैं पिछले अगस्त में भारत से चला था। मुझे पूना समझौते की निजी तौर पर जानकारी नहीं है।
आपके सांप्रदायिकता संबंधी फैसले में यह कहा गया था, ‘महामहिम की सरकार यह चाहती है कि यह बिल्कुल साफ तौर पर समझ लिया जाए कि वे किसी भी बातचीत में कोई पक्ष नहीं हो सकते, जो उनके फैसले का पुनरीक्षण करने की दृष्टि से शुरू की जाए और वे किसी भी प्रतिवेदन पर विचार करने के लिए तैयार नहीं होंगे, जिसका उद्देश्य उसमें परिवर्तन कराना है, जिसे सभी प्रभावित पक्षों का समर्थन प्राप्त नहीं है।
जबकि आपके फैसले के अंतर्गत हिंदुओं को (सभी अभिकथित दलित वर्गों सहित 80 स्थान दिए गए हैं, मुसलमानों को 119 स्थान मिले हैं अर्थात् हिंदुओं से ज्यादा, 50 प्रतिशत। यूरोपीय हितों को 25 स्थान अर्थात् कुल स्थानों का 10 प्रतिशत जबकि वे कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत का एक अंश भी नहीं हैं। स्थिति, प्रभाव, शिक्षा, आदि तत्त्वों पर प्रकटतः विचार किया गया है और यूरोपीयों के मामलों में विधिसम्मत रूप से विचार किया गया है। लेकिन हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जनसंख्या का विचार नहीं किया गया है। मुसलमान 21 वर्ष से नीचे के बच्चों को मिलाकर 54 प्रतिशत होने का दावा करते हैं, जबकि यदि केवल वयस्कों को गिना जाए तो मुसलमानों का कोई
खास बहुमत नहीं होगा।
यदि मुसलमान कुल जनसंख्या के 54 प्रतिशत हैं तो भी हिंदुओं से 50 प्रतिशत अधिक स्थान पाना विशेष स्थानों के बनने की वजह से बताया गया है, 51 हैं जो हिंदुओं से अनुपात में कहीं अधिक हैं।
विशेष स्थानों की प्रकृति से जिनके अंतर्गत यूरोपीयों के लिए 25, आंग्ल-भारतीयों के लिए 4, श्रमिकों के लिए 8, अपने आप में यह बात स्पष्ट नहीं होती कि हिंदू लोग इन स्थानों से कुल स्थानों में अपना उचित हिस्सा पूरा कर सकते हैं।