11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 259

242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. मैं पूरी तरह समझता हूं कि अपने फैसले के शब्दों को ध्यान में रखते हुए आप तर्क नहीं सुन सकते, चाहे वे कितने भी प्रबल हों, लेकिन सर्वोत्तम इरादों से यह फैसला हिंदुओं के लिए अनुचित है और यही सबसे बड़ा कारण है कि दलित वर्गों से भिन्न, बंगाल के हिंदू उसे कम करने पर आपत्ति करते हैं, जो आपके फैसले के द्वारा उन्हें दिया जा चुका है। कृपया मुझे यह कहने की इजाजत दी जाए कि यदि बहस की

खातिर यह मान लिया जाए कि एक समुदाय को उसके हिस्से से लगभग 50 प्रतिशत ज्यादा मिल गया है, तो यह आशा करना बेकार है कि वह समुदाय न्याय की किन्हीं अमूर्त विचारधाराओं से प्राप्त अपने औचित्यरहित फायदे को छोड़ देगा।

  1. प्रस्तुत विषय केवल एक तथ्य का प्रश्न है और वह यह है कि क्या आज शिकायत करने वाले लोग आपके फैसले में संशोधन के लिए सहमत हैं? निवेदन है, अभिकथित व्यतिक्रमों द्वारा समझौते के बारे में श्रमसाध्य तर्क में कोई बल नहीं है, जो भी हो, यह तय करना बाकी है कि क्या ऐसा कोई व्यतिक्रम हुआ है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि बंगाल के गैर-दलित वर्ग आपके एवार्ड में परिवर्तन करने के लिए राजी हो गए हैं।

  2. निवेदन है कि यह मामला इतना महत्त्वपूर्ण है कि इस पर इस आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती कि बिड़ला और ठक्कर का तार तथ्यों को सही दर्शाता है। ये तथ्य वे हैं, जो विवादग्रस्त रहे हैं। यदि इन तथ्यों को सारतः ठीक मान लिया जाए, तो भी कोई समझौता नहीं होगा।

  3. निराश पार्टी के हित में इस तथ्य के बारे में जांच करना कि बंगाल में गैर-दलित वर्ग पूना समझौते में पार्टी था या नहीं अथवा उससे आबद्ध है या नहीं यह काम चाहे भारत सरकार या बंगाल सरकार के माध्यम से अथवा किसी अन्य उत्तरदायी और तटस्थ एजेन्सी के माध्यम से कराया जाए, एक विस्तृत विषय है।

इस पत्र की एक प्रति मैं डॉ. अम्बेडकर को सूचनार्थ भेज रहा हूं। मैं इंग्लैंड से शीघ्र रवाना होने वाला हूं, इसलिए यदि इस प्रतिवेदन की कोई स्वीकृति या जवाब देना हो तो कृपया निम्न पते पर देंः

श्री नरेन्द्र कुमार बसु, एम.एल.सी.

बार एसोसिएशन, उच्च न्यायालय,

कलकत्ता।

आपका

ह./-

एन.एन. सरकार,

सदस्य,

इंडियन राउंड टेबिल कांफ्रेंस