11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 260

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

माननीय रवीन्द्रनाथ टैगोर का केबल तार

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दिनांकः 27 जुलाई, 1933

सेवा में,

माननीय, एन.एन. सरकार,

मुझे याद है कि मैंने प्रधानमंत्री को एक केबल भेजकर उनसे अनुरोध किया था कि महात्मा गांधी जी द्वारा पेश किए गए सांप्रदायिक एवार्ड से संबंधित प्रस्ताव को स्वीकार करने में विलम्ब न करें। उस समय एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी, जो इतनी दर्दनाक थी कि हमें तनिक भी समय या मन की शांति नहीं मिली, ताकि हम पूना समझौते के संभव परिणामों के बारे में शांतिपूर्वक विचार कर सकें। वह उन सदस्यों की सहायता से जिनमें बंगाल का कोई भी जिम्मेदार प्रतिनिधि नहीं था, मेरे आने से पहले किया जा चुका था। तब सपू्र और जयकर पहले ही वहां से जा चुके थे। महात्मा जी का जीवन इस समस्या के तुरन्त समाधान पर निर्भर करता है और ऐसे संकट से उत्पन्न असह्य चिन्ता के कारण मुझे सहसा ऐसा वायदा करना पड़ा है, जिसे अब मैं अपने देश के स्थायी हित के प्रतिकूल की गई गलती समझता हूं। महात्मा जी के प्रति अपार स्नेह के कारण और भारतीय राजनीति में उनकी प्रज्ञा में पूर्ण विश्वास के कारण तथा राजनीतिक व्यवहारों में कोई अनुभव न रखते हुए, मैंने यह सावधानी बरते बिना कि बंगाल के मामले में न्याय की बलि चढ़ा दी गई है और आगे विचार-विमर्श की प्रतीक्षा न करने की भारी गलती की। अब मुझे लेशमात्र भी संदेह नहीं है कि ऐसा अन्याय सभी संबंधित दलों के लिए परेशानी पैदा करता रहेगा और हमारे प्रांत में घोर सांप्रदायिक भावना को जीवित रखेगा, जिससे शांतिपूर्ण शासन हमेशा कठिन रहेगा।

- रवीन्द्रनाथ टैगोर

प्रधानमंत्री के नाम डॉ. अम्बेडकर का पत्र और संलग्नक

इम्पीरियल होटल,

रसल स्क्वायर,

लंदन, डब्ल्यू.सी.आई.,

5 जनवरी 1933

प्रिय प्रधानमंत्री जी,

माननीय एन.एन. सरकार के सौजन्य से मुझे तारीख 19 दिसम्बर 1932 के पत्र की एक प्रति मिल गई है, जो उन्होंने आपको भारत रवाना होने से पहले भेजा था। उसमें उन्होंने बंगाल के सवर्ण हिंदुओं से प्राप्त कुछ तार आपके विचारार्थ रखे हैं, जिनमें इस आधार पर बंगाल के सवर्ण हिंदुओं और दलित वर्गों के बीच पूना समझौते की शर्तों को लागू करने का विरोध किया गया है कि बंगाल के सवर्ण हिंदुओं का उस समझौते में प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था।