244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरे पक्ष की ओर से मुझे भी तार मिले थे। उनमें से एक मैंने माननीय एन.एन. सरकार को दिखाया था। वह सर्वश्री ठक्कर और बिड़ला ने भेजा था, जिन्होंने पूना समझौते के संबंध में हुई बातचीत के दौरान श्री गांधी की ओर से भाग लिया था और उन्होंने अपने पत्र में उसके मूल पाठ को उद्धृत किया है। किन्तु मैं आपको उनके बारे में परेशान करना नहीं चाहता था। पहले तो इसलिए कि महामहिम की सरकार द्वारा पूना समझौते को स्वीकार कर लिए जाने के बाद मेरी राय में यह मामला बन्द हो गया था और दूसरे इसलिए कि माननीय एन.एन. सरकार ने मुझे आश्वासन दिया था कि वह अपने द्वारा प्राप्त तारों को आपकी सूचनार्थ भेजने मात्र से संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि सर्वश्री ठक्कर और बिड़ला द्वारा अपने तार में प्रयुक्त ‘अभिकथित व्यतिक्रम द्वारा समझौते के बारे में श्रम साध्य तर्क’ में कोई बल नहीं और अंत में उसमें यह जोड़ दिया गया है ‘कि बंगाल में गैर-दलित वर्गों के पूना समझौते में पक्षकार होने या उससे आबद्ध होने के तथ्य के बारे में कोई जांच भारत सरकार, बंगाल सरकार अथवा किसी अन्य विचार प्रवण और तटस्थ एजेन्सी के माध्यम से कराई जानी चाहिए’, इसलिए उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न पर मैं अपने विचार रखना आवश्यक समझता हूं।
मेरा पहला निवेदन है कि यदि यह मान लिया जाए कि बंगाल के हिंदुओं का पूना समझौते में प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था, तो भी मात्र इसी कारण उसे बंगाल में लागू होने से नहीं रोका जा सकता। महामहिम की सरकार के सांप्रदायिक एवार्ड का पैरा-4 जिसके अंतर्गत उन्होंने अपने निर्णय की शर्तों को हटाने के लिए एक समझौते का उपबंध किया था, मेरी राय में यह संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए एक परिकाल्पनिक योजना का अनुबंध नहीं करता और याद रहे पूना समझौता, पूरे ब्रिटिश भारत - सवर्ण और दलित - के लिए था। उसकी स्वीकृति के लिए प्रांत के स्थान पर प्रांत एक आवश्यक शर्त थी। वस्तुतः इससे भी आगे मेरा यह कहना है कि अनुबंध अकेले प्रांत की बाबत किसी समझौते के लिए भी सांप्रदायिक फैसले का आधार-तत्त्व नहीं है। जहां तक मैंने पैरा-4 पढ़ा है, उसमें केवल यह अनुबंधित है कि महामहिम की सरकार का समाधान होना चाहिए कि जिन समुदायों का इस बात से संबंध है, वे एक व्यावहारिक वैकल्पिक स्कीम के आधार पर आपस में सहमत हों। पैरा 4 के इस निर्वचन के बारे में यह कहना चाहता हूं कि बंगाल के सवर्ण हिंदुओं के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति पूना समझौते को बंगाल में लागू होने से नहीं रोक सकती। यदि प्रतिकूल निर्वचन सही है, तो पंजाब, संयुक्त प्रांत, बिहार और उड़ीसा के दलित वर्गों के लिए पूना समझौते को भंग कराने का रास्ता
खुला रहेगा, क्योंकि उनका भी कतई प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था।
मेरा दूसरा निवेदन है कि इस धारणा पर आगे बढ़ना वास्तव में जरूरी नहीं है कि बंगाल के सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था, जैसा कि माननीय एन.एन. सरकार द्वारा आपको भेजे गए तार पर हस्ताक्षर करने वालों द्वारा कहा गया है। मैं यह जानता