11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 268

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं इससे सहमत नहीं था?

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डॉ. मुंजेः उस समय डॉ. अम्बेडकर उससे सहमत नहीं थे, लेकिन गोलमेज सम्मेलन के समय डॉ. अम्बेडकर सहमत थे, और उनकी सम्मति से इस तथ्य की घोषणा अमरीकी समाचार-पत्रों में कर दी गई थी।

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं इसे नहीं मानता।

  1. श्री एम.आर. जयकरः डॉ. मुंजे, क्या मैं एक सवाल पूछ सकता हूं। आप कह रहे थे कि हिंदू महासभा ने दिल्ली में पूना समझौता स्वीकार कर लिया था?

डॉ. मुंजेः हां।

  1. श्री एम.आर. जयकरः क्या आप यह कहना चाहते हैं कि हिंदू महासभा ने पूना समझौते को उसके गुण-दोषों पर नहीं, बल्कि इस कारण स्वीकार किया था कि महात्मा गांधी के प्राण बच जाएं?

डॉ. मुंजेः मैं पहले ही कह चुका हूं कि जब समझौता तैयार किया जा रहा था, तो बहुत साफ-साफ कह दिया था कि जिस सिद्धांत के अंतर्गत यह समझौता तैयार किया जा रहा है, मुझे व्यक्तिगत तौर पर या हिंदू महासभा को समग्रतः स्वीकार्य नहीं होगा, क्योंकि यह पृथक-पृथक निर्वाचक-मंडलों पर आधारित है।

श्री भाई परमानन्दः क्या मैं एक शब्द जोड़ सकता हूं। पंजाब के हिंदुओं की भी पूना समझौते के बारे में वही भावना है, जो बंगाल के हिंदुओं की है। राजा नरेन्द्र नाथ ने इसका उसी दिन विरोध किया था, जब हिंदू महासभा ने इसे जल्दबाजी में स्वीकार करते हुए संकल्प पारित किया था। बंबई में पूना समझौते की स्वीकृति के 48 घंटे के भीतर खुले अधिवेशन में हिंदुओं का विरोध प्रकट हुआ था। पंजाब के हिंदुओं के सचिव ने भी विरोध किया था और डॉ. गोकल चन्द ने प्रधानमंत्री को एक तार भेजा था कि पंजाब के हिंदू इसका विरोध करते हैं। हिंदू भावना आज भी इसके प्रतिकूल है। समाचार-पत्रों में इस आशय के लेख निकले हैं, जो मेरे पास इस समय नहीं हैं कि पूना समझौते से पंजाब के हिंदुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। एक और बात यह कि दलित वर्गों की कुछ अनुसूचित जन-जातियों को जो जनगणना रिपोर्ट में अपने को हिंदू लिखवाना चाहते हैं, जैसे बटवाला, बड़वाला, कबीर पंथी और डोम दलित वर्गों की अनुसूचित जन-जातियों में शामिल नहीं किया गया। इस बाबत वे आंदोलन कर रहे हैं। इन जन-जातियों के नाम ही बटवाला, बड़वाला, कबीर पंथी और डोम हैं। पंजाब में उनकी आबादी लगभग 50 हजार है, क्योंकि उन्होंने जनगणना रिपोर्ट में अपने आपको उडि़या लिखवाया था। वे अनुसूचित जन-जातियों में वर्णित नहीं हैं और वे यह आंदोलन इसलिए कर रहे हैं, ताकि उन्हें उनमें शामिल कर लिया जाए। इसलिए इससे उन सबमें,