258 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री बी.सी. चटर्जीः मैं क्यों कहूंगा? मैं ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता कि मैं ऐसा कहूंगा?
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं सोच-समझकर इसे लाया था, क्योंकि मैं जानता हूं कि यह हिंदू अखबार है।
श्री बी.सी. चटर्जीः हां है, मेरे घर आता है, कभी-कभी इसे पढ़ता हूं।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं आपसे पूछता हूं कि दोनों तारीखों को हुए मालवीय सम्मेलन में कार्यवाही लिबर्टी में पहले पृष्ठ पर पूरी छपी हैं?
श्री बी.सी. चटर्जीः यह मैंने आपसे सुना है।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आप स्वयं देख सकते हैं। मैं आपको दे दूंगा।
श्री बी.सी. चटर्जीः मैं इस बारे में आपकी बात मानता हूं।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इसी प्रकार जो कुछ 21 तारीख को हुआ था, वह भी 22 तारीख के अंक में पहले पृष्ठ पर पूरा छपा है।
श्री बी.सी. चटर्जीः मैं मान लेता हूं।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः जिससे कि बंगाल में कोई भी वस्तुतः यह जान ले कि बंबई और पूना में क्या हो रहा है। मैं आपसे एक और बात पूछूंगा?
श्री बी.सी. चटर्जीः हमारा विचार था कि बंगाल के सार्वजनिक संगठनों पर लागू होने वाले इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण फैसले लेने से पहले, उन्हें विचार-विमर्श में भाग लेने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः जब उप-समिति बनाई गई थी, तो उसके गठन के बारे में कोई विरोध प्रकट नहीं किया गया था?
श्री बी.सी. चटर्जीः उन्हें अधिकार नहीं होगा।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः यदि आप लिबर्टी के 22 सितम्बर 1932 के अंक को देखें, तो उसमें वे प्रस्ताव छपे हैं, जो मैंने उप-समिति को दिए थे, जिनके आधार पर मैं बातचीत करने के लिए तैयार था। श्री जयकर मेरी बात की पुष्टि करेंगे कि मैंने कुछ मुद्दे रखे थे जिनके आधार पर मैं बातचीत करने के लिए तैयार था। मैंने अपने प्रस्ताव में बंगाल के लिए 50 सीटें मांगी थीं।
श्री जे. बनर्जीः आपका अभिप्राय दलित वर्गों से है?
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरा अभिप्राय दलित वर्गों से है और फिर भी पं. मालवीय के पास, जिनके बारे में यह माना जाता था कि वे इस आधार पर समझौते की बातचीत करेंगे, बंगाल के सवर्ण हिंदुओं की ओर से विरोध का एक भी वक्तव्य नहीं आया और न ही आपने किसी को पूना भेजा, हालांकि आप जानते हैं कि मैंने यह मांग की थी