भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
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और जैसा कि मैंने कहा, जो 22 सितंबर के अंक में सबसे प्रमुख स्थान पर छपी थी?
श्री जे. बनर्जीः लेकिन मुझे खेद है कि हमने डॉ. अम्बेडकर के प्रस्तावों को उतना महत्त्व नहीं दिया, जितना हमें देना चाहिए था।
- डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इसका नुकसान आपको ही होगा। इसके बारे में मैं आपसे एक-दो सवाल और पूछना चाहता हूं। पूना समझौते को स्वीकार करने की सम्राट की घोषणा दोनों सदनों में केंद्रीय विधान-मंडल में 26 सितंबर 1932 को की गई थी। किन्तु विधान-मंडल ने महामहिम की सरकार की इस घोषणा का जय-जयकार किया था। तब से समझौते की स्वीकृति के खिलाफ राज्य परिषद में या विधान-मंडल में किसी भी सदस्य ने कोई विरोध नहीं किया था। क्या ऐसी बात नहीं है?
श्री जे. बनर्जीः ऐसा हो सकता है।
श्री एम.आर. जयकरः केंद्रीय विधान-मंडल में बंगाल का प्रतिनिधित्च है।
माननीय हरी सिंह गौड़ः डॉ. अम्बेडकर द्वारा लगाए गए लांछन के संदर्भ में कि जब गृह सदस्य माननीय हैरी हेग ने विधान सभा में घोषणा की थी, तब किसी भी सदस्य ने कोई विरोध नहीं किया था, मैं संयुक्त समिति का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं कि यह विधान-मंडल की परिपाटी के अनुसार नहीं है कि जब महामहिम की सरकार के फैसले की घोषणा की जाए, तो सदन का कोई भी सदस्य उस पर विरोध व्यक्त करे।
- लेफटी. कर्नल गिडनेः जब हैरी हेग ने यह वक्तव्य दिया था, मैं सदन में था और उस पर सभी ने खुशी जाहिर की थी?
श्री भाई परमानन्दः मैं भी वहां था, लेकिन इसे लेकर कोई खुशी जाहिर नहीं की थी।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः यदि आप उस शब्द को लें, जिसका वहां पर प्रयोग किया गया था, तो वाह-वाह (एप्लाज) हुई थी।
- लेफटी. कर्नल गिडनेः हां। मेरा अभिप्राय वाह-वाह से था।
श्री भाई परमानन्दः हो सकता है, कुछ लोगों ने किया हो।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः वह पूरा वक्तव्य 26 सितंबर 1932 के प्रोसीडिंग्स ऑफ लेजिस्लेटिव काउंसिल, खंड 5 में दिया गया है और उस वक्तव्य के अंत में ‘एप्लाज’ शब्द कोष्ठकों में दिया गया है। राज्य परिषद में भी यही वक्तव्य दिया गया था। मैं जो, कहना चाहता हूं, वह यह है कि क्या यह एक तथ्य नहीं है कि निम्नलिखित व्यक्तियों ने विधान सभा में सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व किया था? (नाम)। तब राज्य परिषद में निम्नलिखित थे - (उनके नाम)।