11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 282

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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डॉ. मुंजेः मैं अधिसंख्य दलित वर्गों का भी प्रतिनिधित्व करता हूं।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः जहां तक मेरा संबंध है, मैं इस स्थिति से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं। श्री गवई का क्या कहना है? मैं इस बात को फिर से दोहराता हूं कि दलित वर्ग उस संगठन में नहीं है, जिसका प्रतिनिधित्व डॉ. मुंजे करते हैं, जहां तक उनके ज्ञापन का संबंध है, वस्तुतः मुझे पता है कि पंजाब के हिंदू इसका खंडन कर चुके हैं?

डॉ. मुंजेः क्या?

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आपके ज्ञापन संख्या 57 के उस भाग का पंजाब के दलित वर्गों द्वारा खंडन किया जा चुका है।

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अखिल भारतीय वर्णाश्रम स्वराज्य संघ की ओर से श्री एम.के. आचार्य,

श्री एल.एम. देशपांडे, और श्री जे.एल. बनर्जी

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः श्री आचार्य, क्या मेरा यह आकलन सही है कि आप चाहते हैं कि विधान-मंडल को, जिन्हें आप धर्म के मूल तत्त्व कहते हैं, उन्हें प्रभावित करने वाले कानून पारित करने के लिए सक्षम नहीं होना चाहिए।

श्री एम.के. आचार्यः हां।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः और आप चाहते हैं कि ऐसा कोई विधेयक सदन में पेश किए जाने से पहले उस पर धार्मिक मठाधीशों से पूर्व अनुमति ले ली जाए?

श्री एम.के. आचार्यः हां।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः और पेश किए जाने के बाद वह तब तक कानून न बने, जब तक कि दो-तिहाई बहुमत से उसे पास न कर दिया जाए?

श्री एम.के. आचार्यः हां।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः प्रभावित होने वाला समुदाय, यदि हिंदू समाज है, तो वे हिंदू होंगे। यदि मुस्लिम समाज है, तो वे मुसलमान होंगे।

श्री एम.के. आचार्यः प्रत्येक समुदाय प्रभावित होगा। यदि वह हिंदू संप्रदाय है, तो उसमें केवल हिंदू सदस्य होंगे और यदि वह मुस्लिम संप्रदाय हुआ, तो उसमें मुस्लिम सदस्य भी होंगे।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या आप परिभाषित रूप में बता सकेंगे कि आप अपने धर्म के मूल तत्त्व किन्हें मानते हैं, ताकि यह समिति जान सके कि विधान-मंडल कहां तक हस्तक्षेप कर सकता है, अथवा नहीं कर सकता?

श्री एम.के. आचार्यः यदि समिति मुझे तीन घंटे सुने, तो मैं धर्म के मूल तत्त्व पर एक छोटा-सा व्याख्यान देने के लिए तैयार हूं।

  1. माननीय ऑस्टिन चेम्बरलेनः क्या आप हमें ऐसा फार्मूला नहीं दे सकते