11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 287

270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री देशपांडेः मैंने यह नहीं सोचा कि ऐसा करना आवश्यक है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः एक और सवाल मैं आपसे पूछना चाहता हूं। आपने अपनी संयुक्त प्रस्तुति सं. 72 में पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता और केंद्रीय उत्तरदायित्व की मांग की है_ मुझे उसे पढ़ने की जरूरत नहीं है। लेकिन पैरा 4 में, निचले सदनों के लिए मताधिकार के अंतर्गत आपने कहा है - ‘हमारे ज्यादातर देशवासी अभी प्रतिनिधि संस्थाओं को चलाने में अक्षम हैं।’ मैं जो सवाल आपसे पूछना चाहता हूं, वह यह है, ‘किसके फायदे के लिए आप प्रांतीय स्वायत्तता और केंद्रीय उत्तरदायित्व की मांग करते हैं, यदि आप यह कहते हैं कि आपके देशवासी प्रतिनिधि संस्थाओं को चलाने में अक्षम हैं?’

श्री एम.के. आचार्यः मैं माननीय सज्जन से कहूंगा कि वह इस पैरे को ध्यानपूर्वक पढ़ें। उत्तर पहले ही दिया हुआ है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या उत्तर है?

डॉ. एम.के. आचार्यः आप पढ़कर देखें, उत्तर वहीं है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या उत्तर है?

श्री एम.के. आचार्यः हमारा कहना है कि हम निकट भविष्य में मताधिकार का मानदंड अंधाधुंध ढंग से कम करने के विरुद्ध हैं_ अंधाधुंध न्यून करने की हम निन्दा करते हैं_ किन्तु न्यून करने और अधिक तर्कसंगत बनाने हेतु हम प्रांतीय स्वायत्तता और केंद्रीय उत्तरदायित्व पर जोर देने के लिए अगला कदम तुरन्त उठा रहे हैं।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः लेकिन मताधिकार का मानदंड आंख-मूंदकर न्यून करना, आपके देशवासियों को प्रतिनिधि संस्थाओं को चलाने में सक्षम कैसे करेगा?

श्री एम.के. आचार्यः यही तो हम कहते हैं, आंख-मूंदकर न्यून करने से वे सक्षम नहीं हो जाएंगे।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इसलिए उसे कुछ ऊंचा करना चाहिए?

श्री एम.के. आचार्यः नहीं, अंधाधुंध न्यून करने का विलोम है सोच-समझकर न्यून करना।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः केवल ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों तक सीमित करके?

श्री एम.के. आचार्यः सोच-समझकर न्यून करने का यह अर्थ नहीं है। श्वेत-पत्र में 38,000,000 हैं, मैं 20,000,000 या 28,000,000 से संतुष्ट हो जाऊंगा। यह उन्हें इस जाति या उस जाति तक सीमित रखने के लिए नहीं है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आपको पता है कि मालाबार में एक समाज है, जिसे नैयादी कहते हैं?

ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस खंड 2-ग, 2 अगस्त 1933, पृ. 1720