11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 288

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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श्री एम.के. आचार्यः हां।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरी जानकारी में वहां प्रचलित सामाजिक रूढि़यों के अनुसार कोई नैयादी सड़क पर नहीं चल सकता?

श्री एम.के. आचार्यः आज वह सार्वजनिक सड़कों पर चल सकता है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः और यदि वह कोई चीज बेचना या खरीदना चाहे तो जिस माल या वस्तु को वह बेचना चाहता है, उसे सड़क से 60 गज दूर रखना होता है और वहीं से आवाज लगानी होती है।

श्री एम.के. आचार्यः जहां तक मुझे मालूम है, यह सही जानकारी नहीं है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आपको वह जानकारी मैं देता हूं?

श्री एम.के. आचार्यः वह सही नहीं है, मैं इसे इंकार कर सकता हूं। मैं कई वर्ष मालाबार में रहा हूं और मैं मालाबार को अपने माननीय मित्र से बेहतर जानता हूं।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं जो बात आपसे पूछ रहा हूं, वह और भी आगे की है। मान लीजिए मेरे तथ्य सही हैं।

श्री एम.के. आचार्यः जब वे गलत हैं, तो सही कैसे मान सकता हूं।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः सवाल यह है, मान लीजिए, एक कानून पारित करके किसी हिंदू के लिए किसी नैयादी को मालाबार में सार्वजनिक सड़क पर चलने से रोकना अपराध बना दिया जाए, तो क्या आप यह कहेंगे कि उससे आपके धर्म के मूल तत्त्वों पर प्रभाव पड़ेगा?

श्री एम.के. आचार्यः माननीय सज्जन ने गलत तथ्यों पर अपनी धारणा बनाई है, ऐसी कोई प्रथा नहीं है और ऐसी कोई विधि नहीं है। यदि ऐसी कोई प्रथा हो और यदि ऐसी विधि की आवश्यकता हो, तो उस विधि का धर्म के मूल तत्त्वों से कोई टकराव नहीं होगा।

* * * *

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः मैं एक बात साफ करना चाहूंगा। श्री आचार्य आपने कहा कि पंडित मालवीय ने पूना समझौते के भावार्थों का खंडन किया है। उस पर मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं, क्या यह तथ्य नहीं है कि श्री गांधी का कहना है कि पूना समझौता, राजनीतिक समस्या को हल करने के अलावा, हिंदुओं पर कुछ बाध्यता डालता है कि वे अस्पृश्यता को समाप्त कर हिंदू मंदिरों के द्वार अस्पृश्यों के लिए खोल दें?

ऽ मिनिट्स ऑफ ऐविडेंस, खंड 2-ग, 16 अक्तूबर 1933, पृ. 1612

ऽऽ वही, 16 अक्तूबर 1933, पृ. 2376