11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 295

278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शैक्षिक आवश्यकता को ही लें, वे अपने आपको अलग-थलग नहीं पाएंगे?

डॉ. जे.एच. हटनः हो सकता है।

घ 260. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः आप चाहेंगे कि वे पूरी तरह अलग कर दिए जाएं और उनकी आवश्यकता, जैसे शिक्षा, जिसे मैं इन लोगों की सबसे बड़ी आवश्यकता समझता हूं, पूरी तरह गवर्नर के विशेष उत्तरदायित्व के अधीन उसके द्वारा दिए गए राजस्व से ही पूरी की जाए?

डॉ. जे.एच. हटनः हां।

घ 261. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं आपसे पूछना चाहता हूं, कि क्या कोई गवर्नर इस सीमा तक उपबंध बनाएगा कि जो कुछ उसके विचार में आदिवासी वर्गों की शिक्षा के लिए पर्याप्त राशि है, यदि उसके मंत्री उसका समर्थन नहीं करते हैं, तो भी वह उपलब्ध कराएगा?

डॉ. जे.एच. हटनः यह एक भारी कठिनाई है।

घ 262. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैंने जो बात आपसे पूछी है, यदि उसमें कुछ सार है, तो क्या वह वांछनीय नहीं होगा कि इन लोगों के भी कुछ प्रतिनिधि विधान-परिषद में होने चाहिए, जिससे कि मंत्री उनके मतों पर निर्भर रहें और उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल काम करें?

डॉ. जे.एच. हटनः एक या दो मत से किसी मंत्री पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।

घ 263. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरा अभिप्राय एक या दो से नहीं है। संख्या छोटी हो सकती है, किन्तु यदि यह मान लें कि विधान-मंडल में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होगा, तो क्या मंत्री उनके मतों पर निर्भर नहीं करेगा और इसीलिए क्या वह उनकी आवश्यकताओं के प्रति अधिक अनुकूल रुख नहीं अपनाएगा?

डॉ. जे.एच. हटनः सिद्धांत रूप से, लेकिन व्यवहार में नहीं। उनकी संख्या बहुत कम होगी?

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः राजनीति में एक मत से भी पासा पलट सकता है।

घ 264. लॉर्ड यूसटेस परसीः मैं समझता हूं, डॉ. हटन की सिफारिश यह थी कि उन्हें न केवल प्रांत के, बल्कि गवर्नर के भी कार्य-क्षेत्र से अलग कर दिया जाए और यह कि वे केंद्र से प्रशासित हों। क्या बात ऐसी नहीं है?

डॉ. जे.एच. हटनः यही तो वह बात है, जो समग्रतः मुझे पसन्द है। पूरी तरह अपवर्जित क्षेत्र के लिए श्वेत-पत्र के प्रस्तावों के मामले में मैंने यह बात अपने ज्ञापन में कही है, जिसमें गवर्नर जनरल अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है, श्वेत-पत्र प्रस्ताव समाधानप्रद है। मैं यह नहीं कहता कि मुझे यह पसन्द है।

ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ग, 24 अक्तूबर 1933, पृ. 1807-8