11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 298

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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संशोधन प्रस्तुत किया है, ‘श्री चर्चिल मैं तीसरी पंक्ति के अंत में ये शब्द जोड़ने के लिए अनुरोध करता हूं, परन्तु उक्त नीति संबंधी कोई बात इस सदन को भारत में डोमिनियन संविधान की स्थापना से प्रतिबद्ध नहीं करेगी, जैसा कि स्टेट्यूट ऑफ वेस्टमिनिस्टर द्वारा परिभाषित है, परन्तु वही नीति भारत में और भारत के साथ ब्रिटिश व्यापार पर पड़ने वाले प्रतिकूल या विद्वेषपूर्ण विभेद से कारगर ढंग से बचाव करेगी, परन्तु इस मौके पर भारत में स्वायत्त शासन के विस्तार से भारतीय साम्राज्य में शांति व्यवस्था और सुशासन के संसद के अंतिम उत्तरदायित्व पर आंच कोई नहीं आएगी।’

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इस बहस को पढ़ने के बाद, जो हाउस ऑफ कॉमन्स में 3 दिसंबर 1931 को हुई थी, मेरी यह धारणा बनी है कि यदि प्रधानमंत्री आपका संशोधन स्वीकार कर लेते, तो आप प्रधानमंत्री द्वारा पेश किए गए संकल्प के समर्थन में सरकार के पक्ष में मत देने के लिए तैयार थे। क्या यह सही है?

माननीय विंस्टन चर्चिलः मेरे लिए यह सोचना कठिन है कि इन काल्पनिक परिस्थितियों में क्या होता? किन्तु निस्संदेह यह हाउस ऑफ कॉमन्स में कन्जरवेटिव सदस्यों के विशाल समूह के लिए बहुत राहत की बात होती। यदि सरकार उन लोगों की बात से पूरी तरह सहमत होती, जिन्होंने उस संशोधन पर मेरा समर्थन किया था, एक बहुत बड़ी राहत और सर्वथा इससे भी तुरन्त अनुकूल वातावरण बन जाता या पैदा हो जाता।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरा सौभाग्य है, मैं नहीं समझता कि यह विषय-वस्तु काल्पनिक है। क्योंकि मैं समझता हूं कि बहस के दौरान अपने संशोधन के बारे में आपने एक सुनिश्चित दृष्टिकोण अपनाया है और मैं आपका ध्यान आपके भाषण के दौरान व्यक्त किए गए आपके एक या दो कथनों की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं। मेरे विचार में मुझे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिस बात ने मुझे दुविधा में डाला है, वह यह है कि उस समय सदन में उपस्थित अधिकांश सदस्यों की धारणा के अनुसार सरकार जिस बात का आग्रह कर रही थी और आप जो कुछ अपने संशोधन में कहना चाहते थे, उसमें वस्तुतः कोई अन्तर नहीं था। क्या ऐसा नहीं है? मैं एक अनुच्छेद पढ़ना चाहता हूं। मैं कहना चाहता हूं कि जिस विषय ने मुझे हमेशा व्याकुल किया है, वह यह है कि प्रधानमंत्री के वक्तव्य और उस संशोधन को पढ़ने के बाद जिसे आप उस दिन हाउस ऑफ कॉमन्स में पेश करना चाहते थे, मुझे किसी भी तरह कोई अन्तर दिखाई नहीं देता ओर मेरा कहना है कि आपकी भी यही स्थिति थी। आपने स्तम्भ 234 में कहा है, ‘मैं समाप्त कर चुका हूं और मैं इतने लम्बे समय तक उनका ध्यान आकृष्ट किए रखने की अनुभूति के लिए सदन का अत्यन्त आभारी हूं। अपने संशोधन को कायम करने के सिवाए हम क्या कर सकते हैं। यह महामहिम की सरकार के प्रति विश्वास का मत नहीं है’, और यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, ‘इसके विपरीत इसमें केवल उन सिद्धान्तों पर जोर दिया गया है, जिनकी वे स्वयं पुष्टि करते हैं और प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री दोनों पुष्टि कर चुके हैं।’ इस प्रकार स्वयं आपने प्रधानमंत्री के वक्तव्य में प्रस्तुत सुझावों और संशोधन के सारांश में वस्तुतः कोई अन्तर नहीं देखा?