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उप-समिति संख्या 2
(प्रांतीय संविधान)
प्रथम बैठक - 4 दिसंबर, 1930
डॉ. अम्बेडकरऽः मैं अपने विचार तीन शीर्षकों के अंतर्गत रखूंगा, यथा (1) प्रांतीय स्वायत्तता, (2) प्रांतों में उत्तरदायित्व_ और (3) प्रांतीय सेवाएं। मैं प्रांतीय स्वायत्तता और प्रांतीय सेवाओं को पृथक-पृथक मानता हूं। प्रांतीय स्वायत्तता के प्रश्न से प्रांतीय कार्यपालिका और विधायिका बनाम केंद्र सरकार और केंद्रीय विधान-मंडल के संबंधों की परिभाषा का प्रश्न उठता है। पहली बात यह है कि कुछ लोगों का विचार है कि अब समय आ गया है, जब प्रांतीय सरकारों को परिस्थितियों के अनुरूप पूर्ण स्वायत्तता दे दी जानी चाहिए और केंद्र सरकार के वर्तमान नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। महोदय! इस संबंध में मैं अपना यह विचार व्यक्त किए बिना नहीं रह सकता कि इस सम्मेलन में, मैं जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं, उनकी तथा समूचे भारत के हितों और विशेष रूप से मेहनतकश वर्गों की विचारधारा यह है कि प्रांतों को स्वायत्तता देने के लिए भविष्य में नए संविधान के निर्माण के समय हमें उन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा, जो प्रांतीय स्वायत्तता में बाधक सिद्ध हो सकते हैं।
प्रांतीय स्वायत्तता में सबसे पहला बाधक तत्त्व यह है कि इसे प्रांतीय स्वरूप के ऐसे प्रश्नों के अंतर्गत होना चाहिए, जो प्रांतीय होने के साथ-साथ अखिल भारतीय स्वरूप के भी हों। ऐसे विषयों के बारे में प्रांतों को तो अधिकार होने चाहिए, किंतु उन्हें केंद्र
ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 2 (प्रोविंसियल कांस्टीट्यूशन), गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, सैंट्रल
पब्लिकेशन ब्रांच, कलकत्ता, 1931, पृ. 18-22
इस समिति के विचारणीय विषय थेः
(1) प्रांतीय विधान-मंडल की शक्तियां_
(2) प्रांतीय कार्यपालिका की रचना, स्वरूप, शक्तियां और दायित्व।