14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं रखा जा सकता। इस संबंध में, मैं एक उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा। श्रमिक कानूनों का संबंध काश्तकारों और कृषि विषयक, दोनों को प्रभावित करने वाले कानूनों से है। भारत जैसे देश में निस्संदेह इन्हें प्रांतीय विषय माना जाना चाहिए। फिर भी, इन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। इन्हें केवल प्रांतों का विषय नहीं माना जा सकता। प्रांतीय स्वायत्तता के होते हुए भी इस प्रकार के विषयों पर केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र भी होना चाहिए।
दूसरे, प्रांतों को यथासंभव पूर्ण स्वायत्तता देने की दृष्टि से भारत के भावी संविधान में केंद्र और प्रांतीय सरकारों के बीच शक्तियों के विभाजन के समय अपरिभाषित शक्तियों को केंद्र में ही निहित किया जाना चाहिए। इस संबंध में दूसर दृष्टिकोण भी हो सकता है। किंतु हम जानते हैं कि भारत में अलगाव की भावनाएं विद्यमान हैं। यहां राष्ट्रीय भावना की तुलना में प्रांतीय एवं संकीर्ण भावनाएं अधिक प्रबल हैं। जब हम एक ऐसे भारतीय संघ का निर्माण कर रहे हैं, जिसके एककों को पूर्ण स्वायत्तता होगी, हमें भारत को एक मजबूत और संगठित देश बनाने की समस्या का भी सामना करना है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मेरे विचार से शक्तियां केंद्र सरकार में निहित करने से प्रांतों की स्वायत्तता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। कनाडा के मामले में प्रिवी कौंसिल की न्यायिक समिति ने जिस प्रकार शक्तियों के आरक्षण का निर्वचन किया है, उसका यह अभिभावी प्रभाव नहीं पड़ा है। इसका अभिप्रायः ऐसी शक्ति से है, जिसे विशेष रूप से प्रांतों को आबंटित नहीं किया जाता, बल्कि किसी क्षेत्र में आपात रूप में अस्तित्व में आती हैं। मेरे विचार से इससे प्रांतीय स्वायत्तता बिल्कुल प्रभावित नहीं होगी।
प्रांतीय स्वायत्तता के संबंध में दूसरी चीज जिस पर मैं विचार प्रकट करूंगा, वह यह है कि अल्पसंख्यकों और दलित वर्गों के हित-संरक्षण की दृष्टि से स्वायत्तता को सीमित किया जाना चाहिए। भारत के नए संविधान के कारण पैदा होने वाली स्थिति का अनुमान लगाते हुए यह कहा जा सकता है कि कतिपय प्रांतों में कुछ जातियां बहुसंख्यक होंगी, किंतु प्रांतों में दलित वर्ग जिनका मैं प्रतिनिधि हूं, अल्पसंख्यक होंगे। चूंकि सभी प्रांतों में दलित वर्ग अल्पसंख्यक होंगे, हम प्रांतों में बहुसंख्यक वर्गों को इन गरीब लोगों के भाग्य पर निरंकुश एवं अविछिन्न अधिकार कैसे दे सकते हैं कि उन्हें कुप्रशासन के विरुद्ध अथवा उनके हितों की उपेक्षा किए जाने पर अपील करने का अधिकार भी न हो। प्रांतीय सरकार के ऊपर किसी प्रकार का प्राधिकरण अवश्य हो, जो उन्हें प्रांतीय बहुसंख्यकों द्वारा पैदा की गई विपरीत स्थिति से बचाने के लए हस्तक्षेप कर सके।
मैंने इन तीन बातों की ओर आपका ध्यान दिलाया है, जो मेरी राय में भारत में प्रांतीय सरकारों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाती हैं।
प्रांतीय सरकारों में उत्तरदायित्व के प्रश्न के बारे में सर्वप्रथम मैं यह कहना चाहता हूं कि यह इस बात पर निर्भर है कि प्रांतों में विधान-मंडल का स्वरूप क्या होगा? यदि