उप-समिति संख्या 2
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विधान-मंडल में प्रांत की समूची जनता को प्रतिनिधित्व मिलेगा, यदि प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग, जिसे अपना अस्तित्व खतरे में होने का भय हो, को प्रभावी भूमिका दी जाएगी, तो प्रांतीय उत्तरदायित्व के सिद्धांत को मान लेने में कोई हानि नहीं है। यह मेरा प्रथम विचार है।
यदि विधान-मंडल के सभी वर्गों को पूरा और पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाएगा, तो जिन विषयों को सार्वजनिक नियंत्रण के लिए हस्तांतरित किया जा रहा है, उनके संबंध में मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
जहां तक इस प्रश्न का संबंध है कि क्या प्रांतों में सामूहिक उत्तरदायित्व हो अथवा व्यक्तिगत, यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि उत्तरदायित्व न सिर्फ सामूहिक हो, अपितु अनिवार्यतः सामूहिक हो। मैं विधान परिषद का सदस्य रहा हूं और मैंने देखा है कि प्रांतों में सरकारों ने कैसे कार्य किया है। मेरा तथा अन्य लोगों का, जो सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य से विधान परिषद के सदस्य रहे हैं, यह दुखद अनुभव है कि सरकारें ढीले महासंघ के रूप में कार्य करती रही हैं, जिनका किसी स्वीकृत नीति विशेष पर पूर्ण अथवा एकमत दृष्टिकोण नहीं रहा। मंत्रियों की भिन्न-भिन्न राय रही हैं और उनमें एक-दूसरे के समर्थन की कभी इच्छा नहीं रही।
इसका परिणाम क्या हुआ है? ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि मंत्रिमंडल ने सामूहिक रूप से किसी सुविचारित नीति को विधान परिषद के सम्मुख प्रस्तुत किया हो। किसी भी कार्य को सुव्यवस्थित रूप से नहीं किया गया और हम नहीं चाहते कि भविष्य में भी ऐसा हो।
मैं स्वीकार करता हूं कि मंत्रिमंडलों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सुझाव का मैं बहुत अधिक समर्थक नहीं हूं। मै। इस तथ्य को भूला नहीं हूं, बल्कि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यदि मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक समुदायों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो संभव है और इस बात की पूरी संभावना है कि प्रशासन के उन मामलों पर, जो उनके दैनिक जीवन के हितों को प्रभावित करते हैं, उन मंत्रियों की नीति से विपरीत प्रभाव पड़ेगा, जिनका मुख्य हित संप्रदायवाद है। मैं इस बात को क्षण के लिए भी नहीं भुला सकता, किंतु इस प्रकार की बुराई से बेहतर ढंग से भी निपटा जा सकता है और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि अल्पसंख्यकों को उनके हितों के संरक्षण की संवैधानिक गारंटी अधिनियम में ही दे दी जाए, तो हमारी आशंका कि मंत्रिमंडल में सांप्रदायिक तत्वों का प्राधान्य रहेगा, दूर हो जाएगी और मंत्रिमंडल में सांप्रदायिक प्रतिनिधत्व की मांग पर अधिक बल देने की आवश्यकता नहीं रहेगी।
यद्यपि मेरी इच्छा है कि चाहे मुख्यमंत्री कोई भी हो, उसे यह अनुभव करना चाहिए अथवा उसे यह अनुभव कराया जाना चाहिए कि मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाए, क्योंकि हम यह बात एक क्षण के लिए भी नहीं भूल