11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 312

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मेरा आशय यह है कि यदि आप संक्रमणकाल के लिए कोई विकल्प सोचने को तैयार नहीं हैं, तो परिणाम यह होगा कि तब तक किसी का कोई उत्तरदायित्व नहीं हो सकता, जब तक कि संघ नहीं हो?

माननीय सेम्युअल होरः वास्तव में अब डॉ. अम्बेडकर उन मुद्दों को उठा रहे हैं, जिन पर हम तीन साल से चर्चा कर रहे हैं। इन सालों में जो भी चर्चा हमने की है, उसमें हमने यह माना है कि ये प्रस्ताव अखिल भारतीय संघ की आधारशिला पर टिके हैं और मैं इन चर्चाओं के तीन वर्ष बाद इस प्रश्न को फिर से उठाने के लिए तैयार नहीं हूं?

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः यह सच है। मैं इस विषय पर और पैरवी करना नहीं चाहता। मैं आपके विचार के लिए केवल एक विकल्प सुझा रहा हूं। मुझे दो सवाल और पूछने हैं लेकिन मुझे नहीं पता कि वे उस विषय की परिधि के अंतर्गत आएंगे या नहीं जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं। वे संघ के उच्च सदन के अभ्यर्थियों की अर्हताओं के बारे में हैं।

केन्टरबरी के आर्चबिशपः मैं समझता हूं, इसे मताधिकार के अंतर्गत रखना ज्यादा उचित होगा। क्या ऐसा करना ठीक नहीं होगा?

डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं वित्तीय रक्षोपायों के विषय में एक या दो सवाल पूछना चाहूंगा।

केन्टरबरी के आर्चबिशपः मेरे विचार में यह स्पष्टतः वित्त के अंतर्गत आता है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं प्रतिरक्षा के बारे में एक या दो सवाल पूछना चाहता हूं। आपको याद होगा कि प्रतिरक्षा विषयक उप-समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि एक सैन्य परिषद होनी चाहिए। इस विषय पर श्वेत-पत्र में मुझे कोई प्रस्ताव दिखाई नहीं पड़ता?

केन्टरबरी के आर्चबिशपः इसे संवैधानिक प्रस्ताव न मानने के हमारे पास अपने ठोस कारण हैं। यह एक प्रशासनिक प्रस्ताव है।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या आप इसे इसी रूप में लेंगे?

केन्टरबरी के आर्चबिशपः मैं हमेशा भारत में कमेटी ऑफ इम्पीरियल डिफैंस जैसी कोई चीज रखने के पक्ष में रहा हूं। मेरा विश्वास है कि इतना ही आवश्यक नहीं है कि प्रतिरक्षा मंत्रालय और प्रतिरक्षा पदाधिकारियों को प्रतिरक्षा की समस्याओं से जोड़ा जाए, बल्कि आज किसी भी राष्ट्र के जीवन का व्यापक क्षेत्र प्रतिरक्षा के अंतर्गत आता है। हमने देखा है कि ऐसी कोई समिति बहुत मूल्यवान होगी, जिसमें समुचित मंत्री विनिर्दिष्ट विचार-विमर्श के लिए उपलब्ध हो सकें, और नागरिकों का ही नहीं, बल्कि भारत में सैन्य मत का भी एक सुदृढ़ निकाय हो, जो इस प्रकार की ऐसी किसी समिति की प्रगति के पक्ष में हो, लेकिन यह प्रश्न ऐसा नहीं है, जिसका उल्लेख संसद के किसी अधिनियम में किया जाए, बल्कि यह एक अनिवार्यतः प्रशासनिक प्रश्न है।