11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 316

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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ज्ञापन-सांप्रदायिक पंचाट

  1. मेरे विचार में यह संयुक्त प्रवर समिति के मेरे उन साथियों के हित में रहेगा, जिन्हें उन बातों का पता नहीं है, जिनके परिणामस्वरूप यह श्वेत-पत्र तैयार किया गया कि मैं इस ‘सांप्रदायिक पंचाट’ के क्षेत्र, इसकी उत्पत्ति के इतिहास और इसे क्यों तैयार किया गया है? इसके बारे में संक्षेप में कुछ बताऊं। जहां तक सरकार का संबंध है, इसका श्वेत-पत्र में दिए गए अन्य सुझावों के बारे में अपना भिन्न दृष्टिकोण है।

  2. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के प्रथम और द्वितीय, दोनों सत्रों में उन सीटों की संख्या, जो भारत में विभिन्न बड़े समुदायों को विधान-मंडल में प्राप्त होंगी और इन सीटों के निर्वाचन की रीति दोनों के संबंध में भारतीय प्रतिनिधियों के मध्य परस्पर सहमति न हो पाने के कारण उत्पन्न हुई, अड़चन के पश्चात् बड़ी मुश्किल से प्रगति हुई। निर्वाचन के बारे में मुख्य प्रश्न था कि क्या पृथक निर्वाचक-मंडल रखे जाएं या आरक्षित सीटों के साथ संयुक्त निर्वाचक-मंडल की प्रणाली अपनाई जाए। (इन शब्दों के स्पष्टीकरण के लिए देखिए - स्टेट्यूटरी कमीशन की रिपोर्ट के प्रथम खंड के पैरा 149 और 150)। इन समस्याओं के संबंध में सहमति तैयार किए जाने के लिए काफी प्रयास किए जाने के बावजूद बार-बार असफल रहने के कारण अब तक तैयार किए गए संविधान में महत्त्वपूर्ण कमी तो है ही, साथ ही कुछ अल्पसंख्यक समुदाय संविधान के उन अन्य पहलुओं पर आगे किसी प्रकार की चर्चा करने से भी वंचित रहे हैं, जिनका प्रभाव सांप्रदायिक है, जब तक कि उन्हें यह पता न चले कि विधान-मंडलों में उन्हें कितना प्रतिनिधित्व प्राप्त है।

  3. तदनुसार, प्रगति के मार्ग में आने वाली इन बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार को बड़े संकोच के साथ इन मुद्दों पर फैसला करने के लिए बाध्य होना पड़ा है और उसका फैसला न्यूनाधिक रूप से मध्यस्थ के पंचाट जैसा है। सरकार ने ‘अवार्ड’ के उपबंधों को संसद में अपने प्रस्तावों में सम्मिलित किया है। इस अवार्ड में प्रांतीय विधान-मंडलों के गठन और उनके निर्वाचन की रीति का समावेश है। इन बातों में विशुद्ध रूप से अति सांप्रदायिक प्रश्नों, जैसे विशेष हितों के लिए स्थानों की संख्या और विधान-मंडलों के आकार से संबंधित जैसे मामलों में शामिल प्रश्नों को अलग कर पाना असंभव पाया गया। फिर भी, ऐसे मुद्दों पर सरकार को भारतीय मताधिकार (लोथियन) समिति की सलाह से लाभ मिला। ‘अवार्ड’ 16 अगस्त 1932 को जारी किया गया और पैरा 4147 में वर्णित रूप में संसद में पेश किया गया।

  4. दलित वर्गों की बाबत परिवर्तन के अधीन रहते हुए, जिन्हें नीचे स्पष्ट किया गया है, ‘अवार्ड’ के उपबंधों को श्वेत-पत्र के पृष्ठ 81 और 93 पर उद्धृत किया गया है (पृष्ठ 91 पर निर्वाचन विषयक उपबंध कुछ संक्षिप्त रूप में हैं)।

  5. ‘अवार्ड’ के प्राक्कथन में की गई घोषणा का यह अंश बहुत महत्त्वपूर्ण हैः

ऽ इसके अंतर्गत मताधिकार नहीं आता।