300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पैरा 4. ‘सरकार बड़े स्पष्ट शब्दों में यह बता देना चाहती है कि वह स्वयं ऐसी
किसी बातचीत में भाग नहीं लेगी, जो उसके फैसले के पुनरीक्षण की दृष्टि से शुरू
की जाएगी और इसमें उपांतरण किए जाने के उद्देश्य से किए जाने वाले किसी
भी अभ्यावेदन पर विचार करने के लिए तैयार नहीं होगी। यदि सभी प्रभावित पक्ष
इसका समर्थन नहीं करते हैं, तो भी वह किसी सहमतिजन्य समझौते के लिए यदि
यह प्रसन्नतापूर्वक किया जाता है, अपने द्वार खुले रखने के लिए अत्यंत उत्सुक है।
अतः, यदि नवीन भारत सरकार अधिनियम पारित किए जाने से पूर्व उनका समाधान
हो जाता है कि संबंधित समुदायों के गवर्नर के एक या अधिक प्रांतों के संबंध में
या संपूर्ण ब्रिटिश भारत की बाबत किसी व्यावहारिक वैकल्पिक योजना पर परस्पर
सहमति व्यक्त कर दी है, तो वह संसद से यह सिफारिश करने के लिए तैयार है कि
उन उपबंधों के स्थान पर, जिनकी रूपरेखा यहां प्रस्तुत है, नए उपबंध रखे जाएं।
- ‘अवार्ड’ के बाद से दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, जिसका इतिहास संक्षेप में इस प्रकार हैः-
‘अवार्ड’ जारी किए जाने पर श्री गांधी ने दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व से संबंधित इसमें किए गए उपबंधों के प्रति आपत्ति करते हुए उसके विरोध में अनशन करने का फैसला किया, क्योंकि श्री गांधी के विचार में, इससे हिंदू समाज का कृत्रिम विभाजन हो जाएगा। प्रकाशित दस्तावेजों में प्रधानमंत्री ने उन कारणों का उल्लेख किया है, जिससे सरकार इस मत का समर्थन नहीं कर सकी, किंतु श्री गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने अनशन प्रारंभ कर दिया। श्री गांधी के मार्गदर्शन में सवर्ण हिंदुओं के प्रतिनिधियों और दलित वर्गों के प्रतिनिधियों जिनका नेतृत्व डॉ. अम्बेडकर ने किया, के बीच अब बातचीत शुरू हुई। परिणामस्वरूप एक समझौता हुआ जिसे ‘पूना समझौता’ के नाम से जाना जाता है और इसके द्वारा प्रत्येक प्रांत में दलित वर्गों के स्थानों की संख्या उपर्युक्त रूप में बढ़ा दी गई जैसा कि ‘सांप्रदायिक पंचाट’ में सिफारिश की गई थी और एक भिन्न निर्वाचन प्रणाली प्रतिस्थापित की गई। सवर्ण हिंदुओं के लिए हिंदू सीटों (जिन्हें तकनीकी रूप में ‘सामान्य’ सीट कहा गया) और दलित वर्गों की सीटें मिलाकर कुल संख्या ‘पूना समझौते’ के अधीन वही रही, जो मूल ‘सांप्रदायिक पंचाट’ के अनुसार थी। सरकार ने अपने ‘सांप्रदायिक पंचाट’ में उपर्युक्त पैरा 4 में वर्णित उपबंधों के अधीन एक परस्पर सहमतिजन्य व्यवहार्य विकल्प के रूप में उपांतरण करते हुए इस ‘समझौते’ के उपबंधों को स्वीकार कर लिया और इसकी घोषणा किए जाने पर श्री गांधी ने अपना अनशन तोड़ दिया। श्वेत-पत्र के पृष्ठ 91 और 93 पर दिए गए प्रस्तावों में ‘पूना समझौते’ की शर्तों का उल्लेख है।
- अतः, श्वेत-पत्र के प्रस्तावों के संबंध में जिनके अंतर्गत प्रांतीय विधान-मंडलों के गठन और इनके निर्वाचन की रीति का समावेश हैऽ, सरकार की स्थिति ऐसी है कि वह ऐसे
ऽ गलतफहमी दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जा सकता है कि गवर्नर-जनरल के उच्च सदन में दस नामजद सदस्यों में से यह आशयित छह सदस्य ब्रिटिश भारत से और चार देशी राज्यों से होंगे।
ऽऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 20 जुलाई 1933, पृ. 828