11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 318

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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प्रस्तावों को छोड़कर जिन पर संबंधित समुदाय परस्पर सहमत हो जाते हैं, इनमें किसी प्रकार के फेरबदल हेतु संसद से सिफारिश करने के लिए विनिर्दिष्टतः कृतसंकल्प नहीं है और वह इस प्रकार का परिवर्तन किए जाने के प्रयोजनार्थ किसी प्रकार की बातचीत में भाग लेने के लिए भी कृतसंकल्प नहीं है। सरकार के इस दृढ़ संकल्प के निर्वचन के अंतर्गत ‘पूना समझौते’ के वे उपबंध भी सम्मिलित हैं, जिन्हें उसने उपर्युक्त परिस्थितियों में स्वीकार कर लिया है।

  1. मूल ‘सांप्रदायिक पंचाट’ इस तथ्य के कारण केवल प्रांतीय विधान-मंडलों के संबंध में था कि क्रमशः ब्रिटिश भारत के संघीय विधान-मंडल और ब्रिटिश भारतीय देशी राज्यों को दी जाने वाली सीटों की संख्या से संबंधित विनिश्चय के लंबित रहने के कारण केंद्र के लिए तत्स्थानी उपबंध नहीं किए जा सके। श्वेत-पत्र के परिशिष्ट i और ii में दिए गए प्रस्तावों में, जिनका परिशीलन श्वेत-पत्र की प्रस्तावना के पैरा 18 के अनुसार किया जाना चाहिए, अब इस विषय पर सरकार के प्रस्ताव वर्णित हैं। ये प्रस्ताव वास्तव में मूल ‘सांप्रदायिक पंचाट’ के अनुपूरक हैं। फिर भी, सरकार ने उपर्युक्त मूल घोषणा के पैरा 4 में वर्णित दृढ़ संकल्प की भांति उनके बारे में विनिर्दिष्ट दृढ़ संकल्प नहीं किया है। अतः, वह केंद्रीय विधान-मंडल में समुदायों के बीच सीटों के आवंटन के इन प्रस्तावों पर नए सिरे से विचार करने की इच्छुक नहीं है और वह इन प्रस्तावों को अपनी दृष्टि से उस रूप में मानने को तैयार नहीं है, जिस प्रकार वे प्रांतीय ‘सांप्रदायिक पंचाट’ में दिए गए हैं। सरकार को संघीय विधान-मंडल में ब्रिटिश भारत की एक-तिहाई सीटें मुसलमानों को आवंटित किए जाने और क्रमशः ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों को आवंटित सीटों के प्रतिशत, इन दो मुद्दों के संबंध में किसी प्रकार का परिवर्तन किए जाने पर घोर आपत्ति है।ऽ

  2. सारांश में, उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट है कि ‘सांप्रदायिक पंचाट’ में केवल विधान-मंडलों के गठन का उल्लेख है - इसका संविधान में वर्णित विभिन्न प्रकार के मुद्दों, जो कि सामान्य प्रकृति के हैं (उदाहरणार्थ गवर्नरों और गवर्नर-जनरल के विशेष उत्तरदायित्व, केंद्र और प्रांतों के बीच संबंध, मूल अधिकार आदि) से कोई संबंध नहीं है और ‘सांप्रदायिक पंचाट’ में दी गई विभिन्न बातों के संबंध में भी सरकार ने अपनी स्थिति और वे शर्तें स्पष्टतः परिभाषित कर दी हैं, मात्र जिनके आधार पर वह इनसे हटना न्यायोचित समझेगी।

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  1. माननीय ऑस्टिन चैम्बरलेनऽऽः क्या कभी इन कार्यवाहियों के दौरान भारत मंत्री ने हमारे समक्ष इस प्रकार के प्रस्ताव रखने के बारे में सोचा है?

माननीय सेम्युअल होरः अवश्य, मैं समझता हूं कि यह आवश्यक है कि प्रत्येक संविधान अधिनियम में कहीं न कहीं संवैधानिक शक्तियों के लिए उपबंध होना चाहिए।

  1. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं वर्तमान भारत सरकार अधिनियम के इसी प्रकार के उपबंधों की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। परिशिष्ट में कतिपय भागों का उल्लेख है।

ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 21 जुलाई 1933, पृ. 832