16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सकते कि मंत्रिमंडल का पद अत्यधिक महत्त्वपूर्ण पद होता है। एक मंत्रिमंडलीय मंत्री का दायित्व न केवल अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा करना है, बल्कि उसे पूरे प्रांत की सुरक्षा और हितों को भी देखना होता है। उसके लिए योग्यता और क्षमता की जरूरत होती है, केवल सांप्रदायिक दृष्टिकोण की नहीं। मैं चाहता हूं कि अल्पसंख्यक एवं दलित वर्गों के हितों की सुरक्षा के ऐसे प्रावधान किए जाएं कि बहुसंख्यक समुदायों से आए मंत्री संवैधानिक दृष्टि से अल्पसंख्यकों के विरुद्ध कोई कार्य अथवा उनके हितों की उपेक्षा न कर सकें।
गवर्नर और मंत्रिमंडल के बीच संबंधों के प्रश्न के बारे में यह स्पष्ट है कि उत्तरदायी सरकार और सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर आधारित किसी भी संविधान के अंतर्गत गवर्नर देश के दिन-प्रतिदिन प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यह उत्तरदायी सरकार और सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के विपरीत होगा। सरकार को सामूहिक उत्तरदायित्व के आधार पर दिन-प्रतिदिन के प्रशासन का संचालन करने दिया जाना चाहिए।
जब यह सुझाव दिया जात है कि आपात शक्तियों को गवर्नर में निहित किया जाए, तो, मैं उसका तात्पर्य नहीं समझ पाता। क्या इसका तात्पर्य यह है कि जब आपात स्थिति पैदा हो, तो गवर्नर को सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए और जो कानून, अध्यादेश अथवा उपाय वह उचित समझे, उन्हें जारी कर दे, चाहे मंत्रिमंडल ने उसका विरोध किया हो। मैं अच्दी तरह समझता हूं कि गवर्नर को ऐसी सरकार को बर्खास्त करने का पूरा अधिकार होना चाहिए, जो उसके विचार में देश के हित में कार्य नहीं कर रही, किंतु मैं यह बात नहीं समझ सकता कि यदि गवर्नर को मंत्रिमंडल के बिना कार्य करने की अनुमति हो, तो उस प्रांत में उत्तरदायी सरकार कैसे हो सकती है? यह एक बात है कि गवर्नर का मंत्रिमंडल ऐसा हो कि किसी आपात स्थिति में वह उसके साथ सहमत हो सके, किंतु यह कहना दूसरी बात है कि जब आपात स्थिति पैदा हो, तो गवर्नर को मंत्रिमंडल की बिल्कुल परवाह नहीं करनी चाहिए। इस प्रश्न पर कुछ समझौता होना चाहिए, क्योंकि मैं इसे पूरी तरह समझ नहीं सका हूं।
सेवाओं के प्रश्न पर मैं एक बात अवश्य कहना चाहूंगा। मैं सिद्धांत रूप से स्वीकार करता हूं कि प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत प्रांत की सेवाओं को विनियमित करने की शक्ति उसी प्रांत में विहित हो और प्रांतों को अपनी इच्छा, साधनों और परिस्थितियों के अनुरूप सेवाओं के भारतीयकरण करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए। मैं एक विचार व्यक्त करने के लिए बाध्य हूं और वह यह हैः मैं इस तथ्य को भूल नहीं पाता कि भारतीयों में सांप्रदायिक मानसिकता है। हमें आशा है और यही मात्र एक आशा है कि ऐसा समय आएगा, जब सभी भारतीय समस्याओं को सांप्रदायिक दृष्टि से देखना बंद कर देंगे, किंतु यह मात्र एक आशा है, सत्य नहीं है। तथ्य यह है कि भारतीय वर्ग और वर्ग में, संप्रदाय और संप्रदाय में भेदभाव करते हैं और उनके भेदभाव की यह भावना अपने विधि-प्रशासन को लागू करते समय भी रहती है। मैं इस तथ्य को भुला नहीं पाता। मैंने