भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
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समझौता करने के समय बंगाल के सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व हुआ था अथवा नहीं। उसकी वजह से मैंने भी तुरन्त एक पत्र प्रधानमंत्री को लिखा, जिसकी एक प्रति मैं अपनी बारी आने पर समिति के सामने पेश करूंगा। उसमें मैंने भी वे तार भेजे थे, जो मुझे मिले थे, और मैंने यह भी कहा था कि तार में वर्णित यह तथ्य मेरी जानकारी में सही नहीं कि जब पूना समझौता किया गया था, तो उसमें बंगाल के सवर्ण हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था। क्योंकि वस्तुतः मैं जानता था कि बंगाल के अनेक सवर्ण हिंदू समझौते के समय उपस्थित थे, कि उन्होंने मुझसे बातचीत की थी और मुझसे शर्त मान लेने के लिए कहा था। इस समय, इस बारे में मैं केवल यही कहना चाहता हूं।
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- माननीय मिर्जा इस्माईलऽः लॉर्ड लोथियन ने तो कहा था कि विधान-मंडल, जो सरकार को नियुक्त करता है, उच्च सदन के सदस्यों को नियुक्त करेगा। जब एक बार विधान-मंडल द्वारा इन सदस्यों को चुन लिया जाए, तो उनका कोई उत्तरदायित्व नहीं रहता। वे अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और वे हर मुद्दे, जो सरकार के सामने आते हैं, विधान-मंडल के पास जाकर परामर्श नहीं करते। एक बार वे निर्वाचित हो जाएं तो, वे स्वतंत्र हैं, लेकिन संघीय सरकार जो कुछ जानना पसन्द करेगी, वह है प्रांतीय सरकार के विचार।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः प्रांत की किसी भी समय की सरकार?
माननीय मिर्जा इस्माईलः किसी भी समय की।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः और यदि प्रांत की सरकार में परिवर्तन हो जाए, तो क्या केंद्र में भी प्रतिनिधित्व बदलेगा?
माननीय मिर्जा इस्माईलः केंद्र में बदलेगा। यदि आप भारत में, जहां पर अति प्रांतवाद पहले से ही उभर रहा है, उसे रोकना चाहते हैं, तो मुझे यही सबसे बढि़या तरीका दिखाई पड़ता है। सदन में पहले ही आपके पास लोक तत्त्व विद्यमान है। लोकतांत्रिक दृष्टि से प्रांतों में लोकतांत्रिक शासन के कारण इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः उन्हें किसी खास मुद्दे पर मत देने की आज्ञा के साथ भेजिए।
माननीय एम.आर. जयकरः यदि यह योजना अपना ली जाए, तो क्या ऐसा नहीं होगा कि यद्यपि आमतौर पर प्रांतीय विधान-मंडल का कार्यकाल पांच वर्ष में समाप्त होगा और जैसा कि श्री जफरुल्ला खां ने संकेत किया है, उच्च सदन का कार्यकाल सात वर्ष होगा, तो भी कार्मिकों में परिवर्तन लाना आवश्यक है।
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ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 25 जुलाई 1933, पृ. 901
ऽऽ वही, खंड 2-ख, 27 जुलाई 1933, पृ. 945