3. उप-समिति संख्या 2 (प्रांतीय संविधान) - Page 34

उप-समिति संख्या 2

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इस तथ्य के कारण गंभीर मुसीबतों का सामना किया है। भारत के भावी संविधान को लेकर मेरे मन में यह आशंका है कि दलित वर्गों की वर्तमान स्थिति और उनमें शिक्षा के कम प्रचार-प्रसार के कारण तथा इस तथ्य को देखते हुए कि उदाहरण के तौर पर बंबई प्रेसिडेंसी में राजपत्रित पद पर शायद एक भी व्यक्ति नहीं...

एक माननीय सदस्यः एक व्यक्ति है।

डॉ. अम्बेडकरः हां, एक व्यक्ति है, जो अपवाद है। इस व्यक्ति को वहां पहुंचाने के लिए मुझे कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ा, इसे आप जानते हैं? मुझे भय है कि सेवाओं में भारतीयों को लेने से अत्याचार फिर बढ़ेगा और इसलिए मैं इस बात पर बल देना चाहता हूं कि कुछ समय के लिए सेवाओं में अंग्रेजों को रखा जाए। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं कि भारतीयों को लिया ही न जाए। हमारे हितों को ध्यान में रखकर सेवाओं का भारतीयकरण धीमी गति से किया जाए। मेरे दृष्टिकोण में यही बातें थीं, जिन्हें मैं व्यक्त करने का इच्छुक था।

तीसरी बैठक - 8 दिसंबर, 1930

डॉ. अम्बेडकरऽः मैं एक सुझाव देना चाहता हूं। द्वितीय सदन का यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि चर्चाधीन विषयों के साथ इसे जोड़ने से इस पर उचित और पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकती। इस विषय पर चर्चा के लिए एक विशेष दिन नियत किया जाना चाहिए। द्वितीय सदन और अल्पसंख्यक वर्गों का संरक्षण अथवा मद 1 और 2 में दिए गए अन्य किसी मुद्दे के बीच कोई संबंध नहीं है। मैं समझता हूं कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। चर्चाधीन विषय-सूची का ‘विधान-मंडल की संरचना’ के साथ कोई संबंध नहीं है। हमें इस विषय पर चर्चा करने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।

अध्यक्षः आप इस पूरे विषय को अलग कैसे कर सकते हैं?

डॉ. अम्बेडकरः द्वितीय सदन के प्रश्न को निश्चय ही अल्पसंख्यकों से पृथक किया जा सकता है।

अध्यक्षः इसे पूरी तरह से अलग नहीं किया जा सकता। द्वितीय सदन होना चाहिए अथवा नहीं, यह एक ऐसा प्रश्न है, जो हर उठने वोल विषय को, गवर्नर बनाम कार्यपालिका और विधान-मंडल, विधान-मंडल की शक्तियों आदि को प्रभावित करता है। मैं समझता हूं कि हम इस विषय पर बहस करें और यदि अंत में हम यह महसूस करें कि इस पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी है, तो हम इस पर और चर्चा करने की व्यवस्था कर देंगे।

ऽ प्रोसीडिंग्स ऑफ दि सब-कमेटी नं. 2 (प्रोविंसियल कांस्टीट्यूशन), पृ. 56