भारतीय संवैधानिक सुधार समिति
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लॉर्ड यूसटेस परसीः प्रत्येक भारतीय का भी, जिससे भी मुझे प्रश्न पूछने का अवसर प्राप्त हुआ है, यही मत है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः नहीं, वास्तव में यह उनकी राय नहीं है।
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- लॉर्ड रैंकीलरः मैं भी एक प्रश्न पूछना चाहता हूं, जो डॉ. अम्बेडकर के प्रश्न से संबंधित है ओर मेरी समझ में यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। जहां तक गवर्नर जनरल की सम्मति का संबंध है, निश्चित रूप से समस्त संघीय कराधान गवर्नर जनरल की सम्मति के अधीन है। उसके आदेश पर एक संकल्प द्वारा ही, जैसी कि हम यहां चर्चा कर रहे हैं, किसी कर के संबंध में विचार किया जा सकता है?
माननीय सेम्युअल होरः हां, किंतु लॉर्ड रैंकीलर वास्तव में इन दोनों स्थितियों में भ्रम पैदा कर रहे हैं। सामान्य संवैधानिक स्थिति यह है कि धन संबंधी मत सम्राट की पहल पर ही शुरू होते हैं। वास्तव में यह स्थिति अभी विद्यमान है। दूसरी स्थिति यह है जिसमें गवर्नर जनरल भारतीय संविधान में किसी विशेष बाध्यता से हस्तक्षेप करता है।
- लॉर्ड रैंकीलरः मेरा यह निश्चित मत है कि इससे यही अभिप्रेत है, किंतु डॉ. अम्बेडकर को दिए गए उत्तर से यह स्पष्ट है कि पैरा 141 के अधीन संघीय विधान-मंडल को गवर्नर जनरल की पूर्व सिफारिश के बिना कार्य करने की शक्ति होगी।
माननीय एम.आर. जयकरः क्या मैं लॉर्ड रैंकीलर का ध्यान प्रस्ताव 45 की ओर आकृष्ट कर सकता हूं जिसमें कहा गया है, ‘संघीय विधान-मंडल के किसी भी सदन में कराधान के अधिरोपण के किसी भी प्रस्ताव के लिए गवर्नर जनरल की सिफारिश आवश्यक होगी।’
माननीय लॉर्ड रैंकीलरः हां, मैं भी यही समझता हूं। बिल्कुल सही है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकरः इसका गवर्नर जनरल की विशेष शक्ति से संबंध है और ऐसा इसलिए किया गया है ताकि पैरा 138 में परिकल्पित कर केंद्र के अधिकार-क्षेत्र में न चले जाएं, अपितु उनका वितरण प्रांतों में करना होगा।
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- डॉ. भीमराव अम्बेडकरऽः अध्यक्ष महोदय! क्या मैं कुछ जानकारी प्राप्त करने के लिए, न कि किसी प्रकार का विवाद पैदा करने के लिए, बीच में कुछ कह सकता हूं? समिति इस बात से अवगत है कि ‘वर्तमान और प्रोद्भूत अधिकार’ अभिव्यक्ति के संबंध में कुछ मतभेद हैं। सिविल सेवाओं का अपना अलग दृष्टिकोण है और सम्राट के विधि अधिकारियों का अपना अलग और मेरे विचार में इस समिति को खंड का प्रारूपण किए जाने से पूर्व इस विषय के संबंध में कुछ राय व्यक्त करनी होगी। ठीक
ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 28 जुलाई 1933, पृ. 1010
ऽऽ वही, पृ. 1018-20