11. भारतीय संवैधानिक सुधार विषयक संयुक्त समिति के समक्ष लिया गया साक्ष्य - Page 338

भारतीय संवैधानिक सुधार समिति

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होर आपसे पूछना चाहता हूं कि ‘यदि उस चर्चा को रोका जाता है, जिसमें वायसराय के विशेष उत्तरदायित्व की आलोचना होने जा रही है, तो निश्चय ही यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह पूर्व मंजूरी का नियम विधान-मंडल के बाहर प्रेस में या सार्वजनिक मंचों पर चर्चा को रोकने के लिए निश्चित रूप से लागू नहीं किया जा सकता और ऐसे मुद्दों पर जिसे पूर्व मंजूरी के अंतर्गत विधिसम्मत रूप से लाया जाएगा, सार्वजनिक प्रदर्शनों को भी रोका नहीं जा सकता। इस प्रकार, इस पूर्व मंजूरी के नियम का परिणाम यह होगा कि बहस को रोके जाने की प्रेस में और लोक मंचों पर व्यापक रूप से चर्चा और आलोचना होगी तथा सार्वजनिक प्रदर्शन भी हो सकते हैं। केवल विधान-मंडल पर ही छींका लगा रहेगा।

माननीय सेम्युअल होरः बात कहने का यह एक तरीका है। यह डॉ. अम्बेडकर का मत व्यक्त करने का अपना ढंग है।

12,029. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः क्या इसे पेश करने का यह तरीका उचित नहीं है? किंतु यह बात स्पष्ट है और मेरा यह दृढ़ मत है कि वायसराय की पूर्व मंजूरी की शक्तियों का विस्तार इतना नहीं हो सकता कि उससे नियम की पूर्व मंजूरी के विषय पर प्रेस या जन-सभाओं में या अन्यत्र होने वाली चर्चा को रोका जा सके?

माननीय सेम्युअल होरः यह सही है कि इस प्रकार की चर्चा होगी। तथापि, मेरे विचार में विधान-मंडल में होने वाली बहस और बाहर होने वाली अपेक्षाकृत गैर-उत्तरदायी बहस में अंतर है। दूसरे, पूर्व सम्मति की यह मंजूरी कुछ समय से प्रवर्तन में है और प्रत्येक गोलमेज सम्मेलन में इसे नवीन संविधान के एक भाग के रूप में व्यापकतः स्वीकार किया गया। तीसरे, यदि डॉ. अम्बेडकर पैरा 119 में वर्णित विभिन्न प्रवर्गों को देखें, तो उन्हें यह पता चल जाएगा कि उनमें से प्रत्येक के लिए एक प्रकार की विशेष पूर्व सावधानी बरतने की विशिष्टतः अपेक्षा की गई है। उदाहरणार्थ, धार्मिक अधिकारों और प्रथाओं के प्रश्न पर विचार करते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि रूढि़वादी हिंदुओं के कुछ वर्ग इस विषय पर बड़ी उग्र भावनाएं रखते हैं। डॉ. अम्बेडकर इन लोगों से भले ही सहमत न हों और उन्हें गलत मानें। किन्तु यह सत्य है कि वे लोग इस विषय में बड़े उग्र विचार रखते हैं और वे चाहते हैं कि उनके धार्मिक अधिकारों और प्रथाओं से संबंधित किसी भी प्रश्न पर भारतीय विधान-मंडल में बिल्कुल भी चर्चा न हो। अब हमने इन दोनों विचारधाराओं में मध्यमार्गी दृष्टिकोण अपनाया है। इनमें से प्रत्येक प्रवर्ग के संबंध में मेरा यही मत है और मैं यह कह सकता हूं कि अधिकांश जनमत चाहता है कि ऐसे विषयों में एक प्रकार की विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए।

12,030. डॉ. भीमराव अम्बेडकरः मैं यह समझाने की चेष्टा कर रहा हूं कि विधान परिषद और विधान सभा का प्रत्येक सदस्य इन विषयों पर बाहर जनता के बीच चर्चा करने के लिए तो स्वतंत्र होगा, किंतु विधान-मंडल के सदन में इस बाबत चर्चा करने से उसे वंचित किया जाएगा। इस पूर्व मंजूरी के नियम द्वारा आप मात्र यही भेद उत्पन्न करेंगे?

ऽ मिनिट्स ऑफ एविडेंस, खंड 2-ख, 10 अक्तूबर 1933, पृ. 1130